Hari Shankar Parsai – हरिशंकर परसाई कौन थेंं

भारतीय हिंदी साहित्य जगत में कई प्रकार के लेखक कवि हरिशंकर परसाई व्यंगकार उपन्यासकार आलोचनाकार आदि हुए हैं

Harishankar Parsai in hindi language हम लोग इस लेख में हरिशंकर परसाई के जीवनी के बारे में जानेंगे हम लोग इस लेख में जानेंगे कि हरि शंकर परसाई कौन थे उनका जीवन परिचय उनका जन्म कहां हुआ था और कब हुआ था

हरिशंकर परसाई के शिक्षा के बारे में उनके साहित्यिक जीवन के बारे में Harishankar Parsai की रचनाएं उनका मृत्यु कब और कहां हुआ सारी जानकारी हम लोग इस लेख में जानने वाले हैं तो आप लोग यह आर्टिकल पूरा जरूर पढ़ें आइए नीचे जानते हैं हरिशंकर परसाई के बारे में

Harishankar Parsai in hindi language

Harishankar Parsai एक उच्‍च कोटि के व्यंग कार एवं प्रसिद्ध लेखक थे उन्‍होंने अपनी पहचान व्यंग लिखकर एक अलग ही बना लिया था भारतिय हिंदी साहित्य जगत में हरिशंकर परसाई का स्थान व्यंग कार के रूप में अद्वितीय माना जाता है उनकी लोकप्रियता उनके व्यंग की वजह से है

उन्होंने बहुत सारी कहानियां उपन्यास और निबंध भी लिखे हैं लेकिन उनकी पहचान का कारण व्यंग ही ज्यादा है उन्होंने समाज में अंधविश्वास और रूढ़िवादी पर मजाक बना कर व्यंग के रूप में लोगों के सामने दिखाया है। Harishankar Parsai एक उच्च कोटि के व्यंग कार और लेखक थे

Harishankar Parsai in hindi language

इन्होंने एक अलग तरह का व्यंग लिखकर हिंदी साहित्य में व्यंग  को एक अलग दर्जा दे दिया है उन्होंने आधुनिक युग के राजनीति में जो दोगली और खोखले व्यवस्था है उसके बारे में अपने व्यंग के माध्यम से लोगों के सामने रखा ताकि लोग समझ सके और अपने समाज में सही तरीके से रह सके।

Harishankar Parsai हमेशा चौंक्‍कने रहते थे कि समाज में कहां क्या गड़बड़ हो रहा है उसी पर ध्यान केंद्रित करके वह अपने व्यंग के रूप में रचना करके लोगों को दिखाते थे उन्होंने समाज में फैले अंधविश्वास और राजनीति में भ्रष्टाचार और शोषण को लोगों के को दिखाने के लिए अपने व्यंग को माध्यम बनाया वह व्यंग अपनी मातृभाषा में ही लिखते थे।

हरिशंकर परसाई का जन्म 

Harishankar Parsai मध्य प्रदेश के इटारसी के नजदीक होशंगाबाद जनपद के जमानी गांव के रहने वाले थे उनका जन्म 22 अगस्त 1924 को हुआ था।हरिशंकर परसाई के पिता का नाम जुमक लालू प्रसाद था और उनकी माता का नाम चंपा बाई था हरिशंकर परसाई चार भाई बहन थे उनके माता पिता का मृत्यु बचपन में ही हो गया था

जिससे सभी भाई बहनों के पालन पोषण का जिम्मेदारी हरिशंकर परसाई के ऊपर ही आ गया था उनका जीवन बहुत ही परेशानियों से और कठिनाइयों से बचपन में व्यतीत हुआ था हरिशंकर परसाई अपने बुआ के यहां रहते थे और वही से उन्होंने अपनी शिक्षा ग्रहण की थी।

नाम हरिशंकर परसाई
जन्‍म 22 अगस्त 1924
जन्‍म स्‍थान इटारसी के होशंगाबाद जनपद के जमानी गांव
पिता का नाम जुमक लालू प्रसाद
माता का नाम चंपा बाई
शिक्षा हिंदी के M.A.
कार्यक्षेत्र लेखक, कवि, व्यंगकार उपन्यासकार, आलोचनाकार
व्‍यंग संग्रह वैष्णव की फिसलन,दौड़ता हुआ गणतंत्र,विकलांग श्रद्धा का दौर
कहानी संग्रह हंसते हैं रोते हैं,जैसे उनके दिन फिरे,भोलाराम का जीव,दो नाक वाले लोग
सम्‍मान और पुरस्‍कार साहित्य अकादमी पुरस्कार, शिक्षा सम्मान पुरस्कार और डी लिट की मानद उपाधि
उपन्‍यास रानी नागफनी की कहानी,तट की खोज,ज्वाला और जल
निबंध आवारा भीड़ के खतरे, माटी कहे कुम्हार से,काग भगोड़ा,ठिठुरता हुआ गणतंत्र,प्रेमचंद के फटे जूते,तुलसीदास चंदन घिसे,भूत के पांव पीछे,बेमानी की परत
बाल कहानी चूहा और मैं,चिट्ठी पत्री,मायाराम सुरजन,हरिशंकर परसाई की लघु कथाएं,अपना पराया,

रसोईघर और पखाना,दानी चंदे का डर,यस सर,समझौता अश्लील

हास्‍य व्‍यंग विकलांग श्रद्धा का दौर,दो नाक वाले लोग,क्रांतिकारी की कथा

पवित्रता का दौर,पुलिस मंत्री का पुतला,वह जो आदमी है ना,नया साल

भाषा शैली व्यंग प्रधान भाषा शैली
मृत्‍यु 10 अगस्त 1995

हरिशंकर परसाई की शिक्षा

Harishankar Parsai अपना प्रारंभिक पढ़ाई अपने गांव जमानी से ही पूरा किए थे उसके बाद वह नागपुर चले गए और नागपुर विश्वविद्यालय से ही Harishankar Parsai ने M.A. हिंदी से पूरा किया था पढ़ाई पूरा होने के बाद उन्होंने वन विभाग में भी नौकरी किया।

लेकिन वह नौकरी उन्होंने कुछ ही दिनों बाद छोड़ दिया और किसी स्कूल में अध्यापक के पद पर नौकरी कर लिया लेकिन इसमें उनका मन नहीं लगा और वह नौकरी छोड़ दिए नौकरी छोड़ने के बाद Harishankar Parsai ने लेखन प्रारंभ किया उन्होंने अपना स्वतंत्र लेखन लिखना शुरू किया।

हरिशंकर परसाई का व्‍यक्तित्‍व

परसाई एक ऐसे कवि थे जिन्होंने समाज में फैले सामाजिक पाखंड कुप्रथा कुरीतियों अंधविश्वास आदि के खिलाफ अपनी रचनाओं से व्यंगात्मक और आध्यात्मिक तरीके से विरोध किया वह अपनी कलम के माध्यम से समाज को सुधारना चाहते थे लोगों को समाज में फैले अनछुए पहलू समाजिक पाखंड को दुनिया के सामने रखने का प्रयास किया।

हरिशंकर परसाई का पहचान एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार व्यंगात्मक रचनाएं लिखने से है। परसाई जी की सबसे पहली रचना पत्रिका में वसुधा नाम से प्रकाशन हुआ था उन्होंने अपने लेखक जीवन का शुरुआत जबलपुर से किया था।

उन्होंने अपनी रचनाओं से समाज के रूढ़िवादिता समाज की कई पुरानी रीति-रिवाजों का विरोध किया जिससे कि समाज में एक सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न हुआ और हरिशंकर परसाई भारतीय हिंदी साहित्य में एक सामाजिक व्यंगकार की उपाधि से पहचाने जाने लगे।

हरिशंकर परसाई जबलपुर में देशबंधु अखबार में पाठकों द्वारा पूछे गए प्रश्नों का उत्तर देते थे उसमें मनोरंजन राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय इश्क फिल्मी सामाजिक मुद्दों से जुड़े जो भी क्वेश्चन होते थे उसका आंसर हरिशंकर परसाई देते थे।

परसाई जो भी रचनाएं लिखे हैं उसमें पढ़ने पर ऐसा लगता है कि उसमें सच्चाई है अपनापन है और जो भी पढता है उसे ऐसा महसूस होता है कि लिखने वाला लेखक उसके सामने ही बैठ कर के अपने मन की बात बोल रहा है परसाई जी की पहली रचना स्वर्ग से नरक जहां तक 1948 में प्रहरी पत्रिका में प्रकाशित हुई थी

इस रचना में उन्होंने पाखंड और अंधविश्वास के खिलाफ लोगों को जागरूक करने के लिए लिखा था हरिशंकर परसाई कार्ल मार्क्स के विचारों से बहुत प्रभावित थे उन्होंने अपने कृतियों में पाखंड के खिलाफ व्यंग के द्वारा और सामान्य बोलचाल की भाषा का प्रयोग करके विरोध किया है।

हरिशंकर परसाई का साहित्यिक जीवन 

Harishankar Parsai ने पढ़ाई पूरी करने के बाद किसी स्कूल में अध्यापक के पद पर कार्य करना प्रारंभ किया लेकिन कुछ ही दिनों बाद उन्होंने अपनी नौकरी छोड़कर स्वतंत्र लिखने की ओर अपना ध्यान आकर्षित किया और लिखना प्रारंभ कर दिया उन्होंने जबलपुर जाकर एक साहित्यिक पत्रिका वसुधा में प्रकाशन प्रारंभ किया।

लेकिन इसमें उन्हें बहुत घाटा होने लगा जिस वजह से उन्होंने यह पत्रिका बंद कर दिया और अपना स्वयं का व्यंग उपन्यास कहानी सब लिखना शुरु कर दिया। उस समय समाज में अंधविश्वास और कुप्रथा बहुत सारी फैली हुई थी

उसी के ऊपर उन्होंने व्यंग लिखना शुरू किया उस समय राजनीति में भ्रष्टाचार और शोषण बहुत हो रहा था इस पर भी व्यंग लिखना शुरु कर दिया और लोगों के सामने सच्चाई लाने का प्रयास करने लगे Harishankar Parsai ने प्रहरी नामक पत्रिका में भी प्रकाशन कार्य किया था

जिसमें उनकी पहली रचना स्वर्ग से नरक जहां तक है प्रकाशित हुई थी Harishankar Parsai ने जबलपुर में निकलने वाली एक अखबार देशबंधु में उत्तर देने का कार्य पाठकों को करते थे उनसे कोई भी फिल्म का या कोई भी सवाल पाठक पूछते थे उसका वह जवाब देते थे उस स्तंभ का नाम उन्होंने पूछिए परसाई से रखा था।

Harishankar Parsai ki rachnaye 

हरिशंकर परसाई ने बहुत सारी कहानी उपन्यास निबंध और व्यंग लिखे हैं लेकिन उनकी पहचान एक व्यंग कार के रूप में ही होती है उनके रचनाओं की भाषा मातृभाषा होती थी उन्होंने अपने रचनाओं में भाषा शैली इस तरह का प्रयोग किया था जैसे कोई भी उसे पढेगा तो उसको ऐसा लगेगा की वह सारी घटना जो उस कहानी में या व्यंग में है

उनके सामने हो रही है वह ऐसे रचनाकार थे लोगों को यह महसूस होने लगता था कि लेखक उनके सामने बैठकर ही सारी कहानी सुना रहा है उन्होंने बहुत कम उम्र में ही अपनी एक अलग पहचान बना ली थी

उन्होंने अपने मेहनत के बल पर अपनी पहचान बनाई थी समाज में रूढ़िवादी कुप्रथाओं के विरुद्ध लिखते थे। उनकी रचनाएं कुछ इस प्रकार है

हरिशंकर परसाई के निबंध 

  • आवारा भीड़ के खतरे
  •  माटी कहे कुम्हार से
  • काग भगोड़ा
  • ठिठुरता हुआ गणतंत्र
  • प्रेमचंद के फटे जूते
  • तुलसीदास चंदन घिसे
  • भूत के पांव पीछे
  • बेमानी की परत

 परसाई के हास्य व्यंग 

  • विकलांग श्रद्धा का दौर
  • दो नाक वाले लोग
  • क्रांतिकारी की कथा
  • पवित्रता का दौर
  • पुलिस मंत्री का पुतला
  • वह जो आदमी है ना
  • नया साल
  • घायल बसंत
  • शर्म की बात पर ताली पीटना
  • भगत की गत
  • एक मध्यवर्गीय कुत्ता
  • सुदामा का चावल
  • कंधे श्रवण कुमार के
  • 10 दिन का अनशन

हरिशंकर परसाई की बाल कहानी

  • चूहा और मैं
  • चिट्ठी पत्री
  • मायाराम सुरजन
  • हरिशंकर परसाई की लघु कथाएं
  • अपना पराया
  • रसोईघर और पखाना
  • दानी चंदे का डर
  • यस सर
  • समझौता अश्लील

हरिशंकर परसाई के कहानी संग्रह  

  • हंसते हैं रोते हैं
  • जैसे उनके दिन फिरे
  • भोलाराम का जीव
  • दो नाक वाले लोग

 परसाई के उपन्यास  

  • रानी नागफनी की कहानी
  • तट की खोज
  • ज्वाला और जल

हरिशंकर परसाई का व्यंग संग्रह 

  • वैष्णव की फिसलन
  • दौड़ता हुआ गणतंत्र
  • विकलांग श्रद्धा का दौर 

हरिशंकर परसाई की भाषा शैली

हर कवि और लेखक के अपने लिखने का एक तरीका होता है स्वभाव होता है हरिशंकर परसाई की रचनाओं की भाषा व्यंग प्रधान भाषा होती थी उन्होंने अपने रचनाओं में सामान्य भाषा का प्रयोग किया है

जिसमें व्यंग के तीखेपन एकदम स्पष्ट दिखाई देता है परसाई जी ने हिंदी के साथ अंग्रेजी उर्दू आदि शब्दों का भी प्रयोग अपनी रचनाओं में किया है जिस तरह मुंशी प्रेमचंद्र ने समाज में फैले पाखंड कुप्रथा कुरीति आदि को दूर करने के लिए अपनी रचनाओं के द्वारा विरोध किया

उसी तरह हरिशंकर परसाई ने अपनी रचनाओं में व्यंग के माध्यम से समाज में फैले कुप्रथा कुरीतियों और सामाजिक पाखंडों को दूर करने का प्रयास किया उन्होंने कई कहानी संग्रह व्यंग संग्रह और उपन्यास लिखे हैं।हरिशंकर परसाई ने अपने लेखनी के बल पर समाज के गंभीर सवालों का उन्होंने लोगों के सामने व्यक्त किया।

उनके बहुमूल्य योगदान के लिए बहुमूल्य रचना के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से पुरस्कृत भी किया गया विकलांग श्रद्धा का दौर हरिशंकर परसाई का एक व्यंग निबंध है जिससे कि समाज के विकलांगता को प्रदर्शित करते हैं।

हरिशंकर परसाई की काव्य की विशेषता

परसाई जी ने जो भी काव्‍य लिखे हैं जो भी निबंध कहानी संग्रह उपन्यास लिखे हैं उनकी एक खास विशेषता है वह अपने निबंध उपन्यास कहानी के माध्यम से समाज में राजनीति में जो भ्रष्टाचार और शोषण फैला हुआ है

उसके खिलाफ उन्होंने करारा व्यंग किया है उनका मानना था कि जब तक समाज के तौर-तरीकों समाज के रहन-सहन का अनुभव नहीं हो सकता है तब तक कोई भी व्यक्ति वास्तविक साहित्य  लिख नहीं सकता है अपनी व्‍यंग के माध्यम से ही सभी सामाजिक बुराइयों को दूर करना चाहते थे।

परसाई को मिले पुरस्‍कार 

हरिशंकर परसाई को उनके महान लेखनी के लिए पुरस्कार भी मिले हैं जैसे कि साहित्य अकादमी पुरस्कार शिक्षा सम्मान पुरस्कार और डी लिट की मानद उपाधि से और शरद जोशी सम्मान से उन्हें सम्मानित किया गया था।

हरिशंकर परसाई की मृत्यु 

हरिशंकर परसाई का मृत्यु 10 अगस्त 1995 को हुआ था उनका मृत्यु मध्यप्रदेश के जबलपुर में ही हुआ था उनके मृत्यु से हिंदी साहित्य जगत से एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार का अंत हो गया।

अपनी लेखनी के माध्यम से समाज राजनीतिक सामाजिक भ्रष्टाचार शोषण पाखंड विसंगति अंधविश्वास कुप्रथा कुरीतियां आदि को दूर करने की कोशिश वह हमेशा करते रहे हरिशंकर परसाई में खासियत था कि सामाजिक राजनीतिक व्यवस्था में जो मध्यम वर्ग के लोग फंसते जाते हैं

सच्चाई को दबाया जाता है उसको बहुत ही अच्छे से पहचान जाते थे और उसको खोखली रीति-रिवाजों को वह अपने लेखनी के बल से विरोध करते थे प्रसिद्ध व्यंग्यकार की मृत्यु से हिंदी साहित्य जगत की अपूरणीय क्षति हुई।

साराशं 

हरिशंकर परसाई निर्देश में जागरूकता लाने के लिए सामाजिक बुराइयों को दूर करने के लिए उनकी भर्त्सना करने के लिए सबसे अच्छा उन्होंने अपनी लेखनी से व्यंग की विधा को लिखने के लिए चुना उनका मानना था कि समाज से इन बुराइयों को खत्म करने के लिए व्यंग से बड़ा दूसरा कोई हथियार नहीं हो सकता है

इस लेख में एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार प्रसिद्ध लेखक हिंदी के पहले रचनाकार हरिशंकर परसाई के बारे में उनके साहित्यिक जीवन उनके व्यक्तित्व उनकी रचनाएं उनका मृत्यु उनके जन्म आदि के बारे में पूरी जानकारी दी गई है फिर भी अगर इस लेख से संबंधित कोई सवाल आपके मन में है कृपया कमेंट करके जरूर पूछें।

हमने इस लेख में हिंदी साहित्य जगत के व्यंग कार कहानीकार उपन्यासकार हरिशंकर परसाई के बारे में पूरी जानकारी देने की कोशिश की है Harishankar Parsai biography in hindi आप लोगको यह जानकारी कैसी लगी कमेंट करके जरूर बताएं और शेयर भी जरूर करें।

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