Mirabai – मीराबाई का जीवन परिचय

Mirabai ka jivan parichay in hindi  कृष्ण भक्ति के कवियों और कवित्रीयों में मीराबाई का नाम प्रसिद्ध हैंं।

वह भगवान श्री कृष्ण के अनन्य भक्त थीं।  हम लोग इस लेख में  मीराबाई का जन्म कहां हुआ था,उनका शादी किससे हुआ था,मीराबाई के रचनाओं के बारे में  जानेंगे meerabai in hindi,  तो चलिए नीचे जानते हैं मीराबाई के जीवनी के बारे में।

मीराबाई ने बहुत सारे रचनाएं की है जिन्हें हम लोग भजन कहते हैं उनके भजन बहुत ही विख्यात हुए हैं आज भी हम लोग भजन को गाते हैं मीराबाई भक्ति परंपरा की एक महान गायिका और कवयित्री थी वह एक भगवान कृष्ण के अनन्य भक्त थीं

Mirabai ka jivan parichay in hindi

Mirabai भगवान श्री कृष्ण का परम प्रशंसा करते हुए कभी नहीं थकती थी उन्होंने भगवान कृष्ण की भक्ति पूरे मन से और भक्ति भावना के साथ किया था उनकी रचनाएं भारत में बहुत ही लोकप्रिय हुए हैं।

नाम मीराबाई
जन्‍म 1498 ईस्वी
पिता का नाम रत्न सिंह
दादाजी का नाम राव दूदा
पति का नाम महाराणा युवराज भोजराज
रचनाएं गीत गोविंद टीका,राग गोविंद

राग सोरठ,नरसी का मायरा

राग बिहाग,गरबा गीत,नरसी जी का मल्हार,मीराबाई का मल्हार

मीराबाई का भाषा राजस्थानी शुद्ध साहित्यिक, ब्रजभाषा, पंजाबी, पश्चिमी हिंदी, गुजराती
मृत्‍यु 1560

Mirabai ka jivan parichay in hindi

About Meera Bai in hindi

मीराबाई कृष्ण के प्रेम में इतनी मग्न रहती थी कि उन्हें अपने आसपास भी कुछ दिखाई नहीं देता था वह हर समय भगवान कृष्ण के भक्ति में लीन रहती थी

उनका लगभग सारा समय भगवान कृष्ण के प्रार्थना पूजा करने में ही व्यतीत हो जाता था Mirabai ने कृष्ण को अपने पति के रूप में मान लिया था।

मीराबाई का जन्म

Mirabai के जन्म के बारे में विद्वानों में मतभेद है कोई भी सही नहीं बता सकता कि Mirabai का जन्म कब और कहां हुआ था लेकिन कुछ तथ्यों के अनुसार मीराबाई का जन्म 1498 ईस्वी में राजस्थान में एक राजघराने में हुआ था

उनके पिताजी का नाम रत्न सिंह था रत्न सिंह एक राजपूत सियासत के राजा थे कुछ तथ्यों के अनुसार मीराबाई का जन्म 1503 ईस्वी के आसपास बताई जाती हैं मीराबाई के पिताजी का बचपन में ही मृत्यु हो गया था ऐसा कहा जाता है उसके बाद उनका पालन पोषण उनके दादा ने किया था।

उनके दादाजी भगवान श्री कृष्ण के एक परम भक्त थे जिसके कारण उनके घर साधु महात्माओं का हमेशा आना-जाना रहता था इसीलिए मीराबाई भी भगवान श्री कृष्ण के पूजा करती थी

ऐसा कहा जाता है की मीराबाई की मां ने उनको बचपन में श्री कृष्ण जी के एक मूर्ति खेलने के लिए दी थी इस मूर्ति को खेलते खेलते Mirabai पूजा करने लगी और भगवान श्री कृष्ण के भक्ति में लीन रहने लगी वहां भगवान श्री कृष्ण की मूर्ति  के साथ खेलते पूजा करते उनसे बातें करती हमेशा उसी में मग्न रहती थी।

मीराबाई का शिक्षा

Mirabai के बचपन में ही उनकी माता जी का मृत्यु हो गया था जिस वजह से उनके पालन पोषण में कई परेशानियां होने लगी थी मीराबाई के पिताजी हमेशा अपने कार्यों में व्यस्त रहते थे

और मां का साया उनके सर से हट जाने की वजह से वह अकेला महसूस करने लगी थी पिता के पास वक्त नहीं था छोटी सी उम्र थी इसीलिए उनके दादा जी राव दूदा अपने पास बुला लिए

जब मीराबाई अपने दादाजी के पास मेड़ता में चली गई तो वहां अपने दादाजी के साथ धार्मिक कार्यों में हमेशा लगी रहती थी उन्हीं से शिक्षा दीक्षा प्राप्त की दादा जी से ही पूजा-पाठ धर्म-कर्म के सारी शिक्षा लेती थी

मीराबाई जब छोटी थी तभी वह भगवान कृष्ण के भजन गाया करती थी भगवान कृष्ण की मूर्ति हमेशा अपने पास रखती थी उन्हें गिरधर कहती थी गिरधर को सुबह स्नान कराना मूर्ति को उठाना पूजा करना मूर्ति को सुलाना भोजन कराना इसी में दिन-रात व्यस्त रहती थी कहा जाता है कि भगवान कृष्ण की मूर्ति मीराबाई को एक साधु ने दिया था।

मीराबाई का विवाह 

Mirabai का विवाह 13 साल की उम्र में ही हो गया था मीराबाई का विवाह उदयपुर के राजा महाराणा युवराज भोजराज से हुआ था लेकिन कुछ ही दिनों बाद महाराज भोजराज का मृत्यु हो गया और छोटे से उम्र में ही मीराबाई विधवा हो गई थी

इस विपत्ति के बाद Mirabai भगवान श्री कृष्ण के भक्ति की ओर आकृष्ट हुए और उन्होंने भगवान श्री कृष्ण के भक्ति मेें ही लीन हो गई और उसी को उन्होंने अपने जीवन का आधार बना लिया भगवान श्री कृष्ण के भक्ति में इतना मग्‍न रहती थी की उन्हें अपने घर गृहस्थी समाज किसी से कुछ भी मतलब नहीं रहता था।

उस समय सती प्रथा बहुत प्रचलित था इसीलिए जब उनके पति की मृत्यु हुई तो लोगों ने उन्हें सती होने के लिए विवश किया लेकिन वह इस प्रथा के लिए तैयार नहीं हुई थी और धीरे-धीरे वह दुनिया से अलग होती गई उनका अधिकतर समय साधु महात्माओं के साथ भगवान श्री कृष्ण के भक्ति में व्यतीत होने लगा।

मीराबाई कृष्ण भक्त के रूप में 

Mirabai विधवा होने के बाद भगवान श्री कृष्ण  के भक्ती के  ओर आकृष्ट हो गई और उन्होंने भगवान श्री कृष्ण का भक्ति ही अपने जीवन का आधार बना लिया धीरे-धीरे इस दुनिया से अलग हो गई भगवान के भजन और कीर्तन में ही रहने लगी

उनका अधिकतर समय साधु महात्माओं के संगति में भजन करने में बितने लगा मंदिरों में जा जाकर कृष्ण के भजन गाती और आरती करती कृष्ण भक्ति के में लीन हो जाती थी वह अपने परिवार के लोक लाज को एकदम भूल गई थी।

मीराबाई ने विष पिया

Mirabai जात पात के बारे में भी कुछ नहीं सोचती  थी यह सब देख कर उनके ससुराल वाले उनसे बहुत नाराज होते थे क्योंकि उस समय के जमाने में राजघराने की बहूएं बाहर निकल कर भजन कीर्तन नहीं करती थी

इस वजह से उन्हें तरह-तरह  से सताया जाता था उन्हें परेशान किया जाता था एक बार तो ऐसी मान्यता है कि एक बार उन्हें विष का प्याला दिया गया तब मीराबाई ने उस  विषके प्याले को भगवान श्री कृष्ण काेे भोग लगाकर पी लिया जो कि उनके लिए अमृत बन गया और एक ऐसी मान्यता है कि एक बार उन्हें फूल में सांप डाल कर दे दिया गया था।

उन्होंने जब फूल में हाथ डाला तो सांंप  फूल का माला बन गया मीराबाई संत रैदास को अपना गुरु मानती थी संत रैदास को पहले से ही जानती थी जो कि उनके दादाजी के साथ जब वह पूजा पाठ करने जाती थी तो संत रैदास से उनकी भेंट होती थे

कहा जाता है की कि Mirabai अपने गुरु रैदास से बनारस मिलने जाया करती थी वही वह कई बार गुरु रैदास के साथ सत्संग में भी शामिल होती थी ऐसा माना जाता है कि मीराबाई भगवान श्री कृष्ण के परम भक्त थी इसलिए  भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें साक्षात दर्शन भी दिए थे।

मीराबाई श्री कृष्ण को अपना सब कुछ मानती थी पति प्रेमी दोस्त सब कुछ वह श्रीकृष्ण को ही मानती थी इसी बारे में मीराबाई ने एक दोहा लिखा हैंं।

  • मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरा न कोई
  • जाके सिर मोर मुकुट सोए मोर पति सम होई

मीराबाई की रचनाएं 

Mirabai की रचनाएं अधिकता ब्रजभाषा और राजस्थानी दोनों भाषाओं में रहती थी Mirabai श्री कृष्ण की दीवानी थी उनके प्रेम में और भक्ति  की गहराई में वह खो जाती थी उस समय वह सामाजिक और पारिवारिक सारी लोक लाज को भूल जाती थी

सिर्फ कृष्ण को याद रखती थी इसी वजह से उनके परिवार वालों ने उन्हें घर से निकाल दिया था उसके बाद वह घूम घूम के कृष्ण के भक्ति और भजन करती रहती थी मीराबाई ने भगवान श्री कृष्ण के गुड़गान में सैकड़ों भजन गाय थे उन्हें अपने प्रीतम के रूप में मानती थी कुछ विद्वानों का अनुसार   मीराबाई के ये प्रमुख रचनाएं हैं

  • गीत गोविंद टीका
  • राग गोविंद
  • राग सोरठ
  • नरसी का मायरा
  • राग बिहाग
  • गरबा गीत
  • नरसी जी का मल्हार
  • मीराबाई का मल्हार

मीराबाई  के दोहे और पद

पायोजी मैंने राम रतन धन पायो

वस्तु अमोलक दी मेरे सद्गुरु कृपा करी अपनाया ।।

पायोजी मैंने राम रतन धन पायो

जी पाई जग में सभी खोवायो पायोजी मैंने राम रतन धन पायो।।

बसो मेरे नैनन में नंदलाल।

मोर मुकुट मकराकृत कुंडल, अरुण तिलक दिए भाल।

मोहनी मूरति सांवरी सूरत नैना बने विसाल।

आधर सुधा रस मुरली राजत उर बैजंती माल।।

छुद्र घंटिका कटि तट सोभित नूपुर सबद रसाल।

मीरा प्रभु संतन सुखदाई भक्त बछल गोपाल।

मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई ।

जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई।।

तात मात भ्रात बंधु  अपनों न कोई।

छांड़ि दई कुल की कानि कहा करिहै कोई।।

संतन ढिंग बैठी बैठी लोक लाज खोई।

अंसुवन जल सींचि सींचि प्रेम बेलि बोई।।

अब तो बेल फैल गई आणंद फल होई।

भगति देखि राजी हुई जगत देखि रोई ।

दासी मीरा लाल गिरधर तारो अब मोई।।

यह पद बहुत ही प्रचलित है आज भी हम लोग इसको भजन के रूप में बहुत जगह सुनते हैं और गाते भी हैं।

मीराबाई का व्‍यक्तित्‍व

भगवान कृष्ण को ही अपना सब कुछ मीराबाई मानती थी उन्होंने भगवान कृष्ण के बारे में एक दोहा भी लिखा है कि

मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरा न कोई

उन्हें भगवान कृष्ण के भक्ति करने के लिए भगवान कृष्ण के भक्त बनने के लिए कई कष्टों का भी सामना करना पड़ा था वह सत्संग में जाती थी दिन भर भगवान श्री कृष्ण की पूजा पाठ में लगी रहती थी यह देख कर के उनके घर वाले उनसे बहुत नाराज होते थे

उनका मानना था कि राजघराने की बहू है ऐसे बाहर भजन कीर्तन करती है तो राजघराने की मर्यादाओं के खिलाफ माना जाता था

इसीलिए कई बार मीराबाई को जान से मारने का भी प्रयास किया गया लेकिन माना जाता है कि भगवान श्री कृष्ण के वरदान से उन्हें विश भी अमृत में बदल गया था। भगवान श्री कृष्ण को ही मीराबाई अपना पति अपना मानती थी साधु महात्माओं के साथ घूम घूम के भगवान श्री कृष्ण की लीला का गुणगान करती थी।

मीराबाई की भाषा शैली

भगवान श्री कृष्ण के बारे में गिरधर के लीलाओं के बारे में मीराबाई घूम घूम कर लोगों को बताती थी मंदिर में जाकर भजन कीर्तन करती थी उन्होंने अपने रचनाओं में कृष्ण भक्ति के बारे में अपने हृदय से अपने दिल से गुणगान किया है

उनकी रचनाओं में सरलता और निश्छलता पूर्ण रूप से देखा जाता है मीराबाई ने जो भी कवितायों की रचना की है उसमें प्रेम रस का वर्णन है उसकी भाषा शैली प्रेम पूर्ण शैली है। मीराबाई कि जो रचना है वह उनके द्वारा गाया हुआ भजन है

अपने गिरधर के लिए अपने प्रियतम के लिए उन्होंने दिल से भजन गाया है कृष्ण भक्त के जितने भी कवि हुए हैं उनमें मीराबाई का जो रचना है उसमें परंपरागत पद शैली का प्रयोग किया गया है उनकी रचनाएं गीती काव्य रचना है

मीराबाई के काव्‍यों में कई भाषाओं का प्रयोग किया गया है जैसे कि राजस्थानी शुद्ध साहित्यिक, ब्रजभाषा, पंजाबी, पश्चिमी हिंदी, गुजराती आदि उनके कव्‍यों का भाषा बहुत ही सरल और मधुर और लोगों को प्रभावित करने वाला है।

मीराबाई का साहित्यिक परिचय

Mirabai का भले ही विवाह राणा जी से हुआ था लेकिन वह बचपन से ही भगवान श्री कृष्ण की भक्ति करती थी भगवान श्री कृष्ण को ही अपना सब कुछ मानती थी उन्हें ही अपना पति परमेश्वर मान चुकी थी मीराबाई दुनिया के लोक लाज के बारे में कुछ भी नहीं सोचती थी

बस भगवान श्री कृष्ण के भक्ति में ही दिन रात लीन रहती थी जिस तरह भगवान श्री कृष्ण की प्रेम में ब्रज में गोपीकाएं हमेशा लीन रहती थी भगवान श्री कृष्ण को अपना पति मानती थी उसी तरह से मीराबाई भी अपने आप को भगवान श्री कृष्ण को समर्पित कर दिया था

वह भगवान श्री कृष्ण की उपासना करती थी भजन कीर्तन करती थी उनके घर में बचपन से ही साधु महात्मा का आना जाना लगा रहता था सत्संग होता था धार्मिक कार्य होते थे

इसीलिए मीराबाई भी बचपन से ही किसी साधु के द्वारा दिए गए एक भगवान श्री कृष्ण की मूर्ति को हमेशा अपने पास रखती थी उन को खाना खिलाना सुबह उठा कर स्नान कराना भगवान श्री कृष्ण की मूर्ति को सुलाना भोजन कराना इसी में वह दिन भर रहती थी

भगवान श्री कृष्ण के प्रेम में इतना डूब जाती थी कि मंदिर में जाने के बाद भगवान श्री कृष्ण का भजन गाते गाते नृत्य करने लगती थी उन्हें थोड़ा भी ध्यान नहीं रहता था कि उनके आसपास कौन है कौन नहीं है इसलिए उनके ससुराल वाले उन से बहुत नाराज होते थे उनका मानना था कि राज्य मर्यादा के विपरीत है।

मीराबाई की मृत्यु 

Mirabai घर से निकलने के बाद वह जगह-जगह घूम कर भजन कीर्तन करने लगी थी इसी तरह घूमते घूमते वह वृंदावन चली गई थी वृंदावन कुछ दिन रहने के बाद वह भगवान श्री कृष्ण की नगरी द्वारिका में जा पहुंची थी

वहां भी वह भगवान श्री कृष्ण का भजन करती थी 1560 ईसवी में भगवान श्री कृष्ण के मूर्ति में समा गई थी। ऐसा लोगों का कहना हैं और यह मान्यता हैंं।

लेकिन इसमें कोई साक्ष्य प्रमाण नहीं है इसी तरह मीराबाई हमेशा हमेशा के लिए भगवान श्री कृष्ण में समाहित हो गई Mirabai जब भी गाती थी तो उनकी रचनाओं में माधुर्य भाव की प्रधानता दिखाई देती थी ऐसा कहा जाता है कि जब भी मीराबाई पर कोई संकट आता था भगवान श्री कृष्ण आकर खुद उनकी रक्षा करते थे।

साराशं 

भगवान श्री कृष्ण की अनन्य भक्त उनकी उपासक मीराबाई थी जिन्होंने अपना पूरा जीवन भगवान श्री कृष्ण के पूजा में उनके प्रेम में भक्ति में ही समर्पित कर दिया था इस लेख में मीराबाई के बारे में पूरी जानकारी दी गई है

जिसमे मीराबाई का जन्म कहां हुआ उनका पालन पोषण किसने किया मीराबाई का विवाह किससे हुआ भगवान श्री कृष्ण की भक्ति करने के लिए उन्हें कौन-कौन सा कष्ट दिया गया मृत्यु कब हुआ मीराबाई ने कौन-कौन सी रचनाएं की है।

मीराबाई के जीवनी  के बारे में हमने यहां पर पूरी जानकारी दी है ।हम आशा करते हैं कि आप लोगों को यह जानकारी अच्छी लगी और आप लोग इसे पढ़कर संतुष्ट भी होंगे। इसलिए आप लोग कमेंट करके अपना राय हमें जरूर बताएं और जितना हो सके शेयर भी जरूर करें।

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