Phanishwar Nath Renu – फणीश्वर नाथ रेणु का जीवनी

फणीश्वर नाथ रेणु एक आंचलिक कथाकार के रूप में प्रसिद्ध होने वाले लेखक थे Phanishwar Nath Renu in hindi language उपन्यासकार थे हम लोग इस लेख में फणीश्वर नाथ रेणु के बारे में जानेंगे फणीश्वर नाथ रेणु हिंदी साहित्य युग में आंचलिक कथाकार के रूप में बहुत विख्यात हुए हैं

प्रेमचंद के बाद फणीश्वर नाथ रेणु एक ऐसे लेखक थे जिन्होंने लोगों के निजी जीवन उनके रहन-सहन के ऊपर कहानियां और उपन्यास लिखे हैं फणीश्वर नाथ रेणु का सबसे प्रसिद्ध उपन्यास मैला आंचल हुआ था

जोकि एक आंचलिक उपन्यास था आम लोगों के जनजीवन पर आम लोगों के रहन-सहन पर आधारित यह उपन्यास था आइए जानते हैं फणीश्वर नाथ रेणु का जन्म कहां हुआ उनका व्यक्तित्व कैसा था उनका साहित्य परिचय के बारे में जानते हैं फणीश्वर नाथ रेणु ने कौन-कौन सी रचनाएं किए इसके बारे में पूरी जानकारी प्राप्त करते हैं।

Phanishwar Nath Renu ka jivan parichay

फणीश्वर नाथ रेणु एक स्वतंत्रता सेनानी और एक आंचलिक कथाकार और उपन्यासकार थे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सहयोग दिया था और इन आंदोलनों में भाग लेकर कई बार जेल भी गए थे फणीश्वर नाथ रेणु  का मैला आंचल उपन्यास बहुत ही लोकप्रिय हुआ था

  फणीश्वर नाथ रेणु को उनके आंचलिक उपन्यास  और आंचलिक कहानियों की वजह से पदम श्री पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था फणीश्वर नाथ रेणु का स्थान भारतीय हिंदी साहित्य जगत में एक अलग ही छाप छोड़ गई है उनका स्थान सर्वश्रेष्ठ माना जा सकता है

Phanishwar Nath Renu in hindi language

Phanishwar Nath Renu in hindi 

ग्राम्य जीवन पर उनकी कहानियां आधारित होती थी उनकी कहानियों में और उपन्यासों में ग्रामीण जीवन की विशेषता अधिक दिखाई देती थी और ग्रामीण जीवन के आसपास के परिवेश के बारे में भी कहानियों में झलकियां दिखते थे।

फणीश्वर नाथ रेणु का सबसे पहला उपन्यास मैला आंचल था जो कि बहुत ही प्रसिद्ध उपन्यास हुआ मैला आंचल पर हिंदी फिल्म तीसरी कसम बनाई गई थी फणीश्वर नाथ रेणु को उनके प्रसिद्ध रचनाओं की वजह से पद्मश्री पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था

उन्होंने अपना बचपन एक ग्रामीण परिवेश में व्यतीत किया था ग्रामीण जीवन को उन्होंने बहुत ही नजदीक से देखा था इसीलिए उनकी कहानियों में उपन्यासों में ग्रामीण जीवन के बारे में ग्रामीण परिवेश के बारे में गांव में लोग कैसे रहते हैं

उनके जनजीवन का रहन सहन के बारे में उल्लेख मिलता है फणीश्वर नाथ रेणु जमीदारी प्रथा अंग्रेजों के अत्याचार को सहा भी था और लोगों को सहते हुए देखा भी था किसान और मजदूरों की हालत देख कर के वह बहुत दुखी हो जाते थे

साहूकारों का शोषण उन्होंने बहुत ही नजदीक से देखा था इसीलिए अंग्रेजो के खिलाफ उनके मन में भी बहुत क्रोध रहता था उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

फणीश्वर नाथ रेणु का जन्म

फणीश्वर नाथ रेणु का जन्म 4 मार्च 1921 में हुआ था बिहार राज्य के पूर्णिया जिला के औराही हिंगना नाम के एक गांव में हुआ था फणीश्वर नाथ रेणु का  बचपन ग्रामीण परिवेश में ही बीता था इसीलिए उनकी अधिकतर रचनाओं में ग्रामीण परिवेश के बारे में ही चर्चा मिलता है

फणीश्वर नाथ रेणु के पिता का नाम शीला नाथ मंडल था और उनकी माता का नाम पारो देवी था।उनके पिताजी भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में हमेशा सक्रिय रहते थे रेणु जी के पिताजी का विचार आधुनिक था और वह कला और संस्कृति में विशेष रूचि रखते थे

फणीश्वर नाथ रेणु को अपने पिता से बहुत ही ज्यादा बढ़ावा और प्रोत्साहन मिला था उनके पिता हमेशा उन्हें राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के लिए देश के लिए मर मिटने के लिए प्रोत्साहन देते थे

उनके पिता कहते थे कि अपने देश को आजादी दिलाने के लिए यहां के आम जनता को सही रास्ता दिखाने के लिए अगर जान भी चली जाए तो कोई दुख की बात नहीं है देश भक्ति का गुण उन्हें अपने परिवार से ही मिला था

उनके पिता एक किसान के साथ-साथ एक स्वतंत्रता सेनानी भी थे फणीश्वर नाथ रेणु के माता भी स्वतंत्रता संग्राम में अपना महत्वपूर्ण योगदान देती थी फणीश्वर नाथ रेणु अपने माता पिता के बताए रास्ते पर हमेशा चलते रहे देश हित के लिए हमेशा कार्य करते रहे।

फणीश्वर नाथ रेणु की शिक्षा

Phanishwar Nath Renu की प्रारंभिक पढ़ाई फारबिसगंज से हुई थी वहीं से उन्होंने मैट्रिक भी किया और बनारस से पीएनजी कॉलेज में एडमिशन लिया था भारत और नेपाल दोनों जगह से हुई थी

उन्होंने मैट्रिक नेपाल के विराटनगर के आदर्श विश्वविद्यालय से किया था उसके बाद काशी हिंदू विश्वविद्यालय से उन्होंने इंटरमीडिएट पास किया था इंटर करने के बाद फणीश्वर नाथ रेणु ने 1942  के बाद स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े थे।

फणीश्वर नाथ रेणु का विवाह

बिहार के अररिया जिले के फारबिसगंज के रहने वाले फणीश्वर नाथ रेणु का शिक्षा भारत और नेपाल दोनों जगह पर हुई थी लेकिन पढ़ाई के साथ ही भारत को स्वतंत्र कराने के लिए वह जागृत रहते थे अंग्रेजो के खिलाफ उनके मन में बहुत क्रोध रहता था अंग्रेजो के द्वारा अत्याचार किसानों और मजदूरों का परेशानी व शुरू से देखते आ रहे थे

रेणू जी का विवाह पहला विवाह रेखा रेणु से हुआ था जो कि कटिहार जिले के बलुआ गांव की रहने वाली थी रेनू जी के पहली पत्नी से उन्हें एक बेटी थी जिनका नाम कविता राय था

पहली पत्नी की मृत्यु हो जाने के बाद उन्होंने दूसरा विवाह पद्मा रेणु से किया जो कि कटिहार जिले के ही महमदिया गांव की रहने वाली थी। पद्मा रेणु से उन्हें 3 पुत्र और तीन पुत्रियां हुई फिर तीसरा विवाह उनका लतिका रेणु से हुआ था जिनसे उनका मुलाकात 1942 की क्रांति में हुआ था।

फणीश्वर नाथ रेणु के स्वतंत्रता आंदोलन में सहयोग

फणीश्वर नाथ रेणु मेें बचपन से ही अपने आसपास जमीदारी प्रथा साहूकारों का शोषण और अंग्रेजों के जुल्म और अत्याचारों को देखते आए थे उनसे यह सब सहन नहीं होता था

इसीलिए उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में अपना योगदान दिया था उन्होंने कई आंदोलनों में सहयोग दें दिया था किसानों के बहुत उन्होंने मदद की थी 1977 में जब जयप्रकाश आंदोलन से जुड़े थे।

उस समय लेखकों और पत्रकारों की आवाज दबाया जाता था इसके खिलाफ आंदोलन किया था उन्होंने अपनी रचनाओं में भी इन सबके का वर्णन किया था फणीश्वर नाथ रेणु का संबंध बिहार से था

इसलिए उन्होंने ज्यादातर कार्य बिहार पटना में किया था स्वतंत्रता के बाद भी उन्होंने गांव के जीवन पर बहुत नजदीक से देखा था गांव में रहने वाले लोगों के परेशानियों को उन्होंने समझा था।

रेणु जी जब मैट्रिक के पढ़ाई कर रहे थे तभी से वह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में जाना चाहते थे पढ़ाई पूरी करके उन्होंने छात्र संघर्ष समिति में शामिल हो गए पटना विश्वविद्यालय से उन्होंने अपने ग्रेजुएशन पास किया

जब वह पटना में ग्रेजुएशन पास कर लिये उसके बाद छात्र संघर्ष समिति के माध्यम से छात्र के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ने लगे और अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद स्वतंत्रता आंदोलन में एक क्रांतिकारी के रूप में हिस्सा लेने लगे।

फणीश्वर नाथ रेणु ने 1950 में नेपाल में एक इतने क्रांतिकारी आंदोलन में भाग लिया इसी आंदोलन के बाद नेपाल में जनतंत्र का स्थापना हुआ उसके बाद जब भारत में आए तब यहां पर जयप्रकाश नारायण के द्वारा क्रांति आंदोलन चल रहा था

जो कि संपूर्ण क्रांति आंदोलन में उन्होंने अपना योगदान दिया 1952 में फणीश्वर नाथ रेणु को कोई बड़ी बीमारी हो जाने के वजह से वह बहुत परेशानी में हो गए थे जिसके बाद उन्होंने अपना पूरा ध्यान रचनाएं लिखने में देने लगे जो कि सबसे पहला उपन्यास उनका मैला आंचल था और यह उपन्यास बहुत ही प्रसिद्ध भी हुआ।

फणीश्वर नाथ रेणु का व्यक्तित्व

रेणु जी का बचपन ग्रामीण परिवेश में व्यतीत हुआ था उन्होंने बचपन से ही साहूकारों के द्वारा गरीब लोगों को प्रताड़ित करना अंग्रेजो के द्वारा आम जनता को अत्याचारित करना देखा था वह हमेशा आम लोगों के मदद करते रहे।

गरीबों को दमन तथा शोषण करने के विरुद्ध हमेशा आवाज उठाते रहे 1942 में जब उन्होंने स्वाधीनता संग्राम में योगदान दिया जिसके बाद वह 3 वर्ष तक जेल में नजरबंद रहे लेकिन जब जेल से छूटे तो उन्होंने किसान आंदोलन का भी नेतृत्व किया

 फणीश्वर नाथ रेणु ने अपनी रचनाओं में गांव के लोगों का सामाजिक जीवन राजनीतिक जीवन सांस्कृतिक जीवन के बारे में बहुत ही अच्छे से वर्णन किया है। आंचलिक उपन्यासकार के रूप में प्रेमचंद जी को जो ख्याति मिलती थी

प्रेमचंद जितना सर्वश्रेष्ठ उपन्यासकार थे उनके बाद फणीश्वर नाथ रेणु का दूसरा सर्वश्रेष्ठ स्थान दिया जाने लगा मैला आंचल लिखने के बाद वह रातों-रात एक प्रसिद्ध उपन्यासकार के रूप में ख्याति उन्हें मिलने लगी

फणीश्वरनाथ रेणु की रचनाएं

हिंदी साहित्य में आंचलिक उपन्यासकार के रूप में आंचलिक कथाकार के रूप में पहले मुंशी प्रेमचंद का नाम लिया जाता था लेकिन जब फणीश्वर नाथ रेणु ने मैला आंचल जैसा उपन्यास लिखा तो रातो रात एक प्रसिद्ध कथाकार के रूप में उभर कर आए

उनके उपन्यासों में कहानियों में साहित्य में गांव की भाषा गांव का बोलचाल गांव की संस्कृति गांव में जिस तरह से लोग  जीवन जीते हैं लोक लाज में रहते हैं उनके लोकोक्तियां लोकगीत मुहावरे आदि होते हैं उ

न्हीं का वर्णन रेणु ने अपने कहानियों में उपन्यासों में किया है दूसरी तरफ उनकी रचनाएं स्वतंत्र भारत के विकास करने के लिए प्रसिद्ध थे मैला आंचल उपन्यास के लिए उन्हें पद्मश्री का सम्मान भी मिला था

उन्होंने अपनी रचनाओं में अपने गांव के बोलचाल ग्रामीण जीवन में जिस तरह से लोग रहते हैं उनका रहन-सहन आदि का वर्णन किया है गांव में पहले साहूकार गरीब किसानों को प्रताड़ित करते थे गरीब लोगों को खाने-पीने का पैसों का हमेशा तंगी रहता था उसी से संबंधित फणीश्वर नाथ रेणु ने अपनी रचनाओं में कहानियां लेख लिखे हैं।

Phanishwar Nath Renu ki rachna 

फणीश्वर नाथ रेणु के उपन्यास

  • मैला आंचल
  •  कलंक मुक्ति
  • परती परीकथा
  • दीर्घतपा
  •  पलटू बाबू रोड
  • कितने चौराहे जुलूस।

Phanishwar Nath Renu ki kahani

  • लाल पान की बेगम
  • पंचलाइट
  • तबे एकला चलो रे
  •  मारे गए गुलफाम
  • संवदिया
  • एक आदिम रात्रि की महक
  • ठेस

कथा संग्रह

  • एक श्रावणी दोपहर की धूप ठुमरी
  • अच्छे आदमी
  • अग्नि खोर
  • एक आदिम रात्रि की महक

फणीश्वर नाथ रेणु का साहित्यिक जीवन

Phanishwar Nath Renu की अधिकतर रचनाएं आंचलिक थी इसलिए उनका स्थान सबसे ऊपर था एक नया शैली का उपयोग किया था फणीश्वर नाथ रेणु एक ऐसे लेखक थे जिन्होंने अपने साहित्य के साथ साथ राजनीति में भी काफी रूचि रखने वाले थे

उन्होंने 1950 में नेपाल के राजा के खिलाफ भी आंदोलन चलाया था जिसमें उनके शासन के खिलाफ आंदोलन हुआ था उनकी कहानियों में ग्राम में जीवन की भाषा विचार जीवन शैली परंपरा है लोकगीत लोक प्रथा इत्यादि की झलक दिखाई देती थी

आंचलिक कहानियों में उनकी कहानियां कुछ सबसे सर्वश्रेष्ठ थी जिनमें थे पंचलाइट संबंधी या एवं लाल पान की बेगम  सबसे प्रमुख थी लाल पान की बेगम बहुत ही मर्मस्पर्शी कहानी थी।

जो लोगों को बहुत  अपनी ओर आकृष्ट किया था वैसे तो आंचलिक कहानियां और उपन्यास बहुत लेखक ने लिखा था लेकिन फणीश्वर नाथ रेणु ने उन सब में अपना स्थान ऊपर कर दिया था उनकी रचनाओं में  कहानियों और उपन्यासों में ग्रामीण जीवन की झलक एकदम सजीव दिखती थी।

ऐसा लगता था जैसे वह सारी घटना हमारे सामने चल रही है उन्होंने अपनी सारी रचनाएं बहुत ही इमानदारी से लिखा करते थे उनकी एक कहानी मारे गए गुलफाम पर हिंदी फिल्म तीसरी कसम भी बन चुके हैं

मैला आंचल उनकी एक बहुत ही प्रमुख उपन्यास और उच्च कोटि के उपन्यास थे इसमें 1947 के भारतीय ग्रामीण जीवन के बारे में लिखा गया है और इनके उपन्यास की भाषा बिल्कुल ग्राम्य जीवन की भाषा और साफ-सुथरी भाषा रहती थी।

फणीश्वर नाथ रेणु की भाषा शैली

रेनू जी के काव्‍यों में उनकी रचनाओं की भाषा शैली गांव में रहने वाले लोगों की आम भाषा खड़ी बोली का वर्णन है उनके काव्य में जो भाषा शैली का इस्तेमाल किया गया है वह भाषा रेणु जी के गांव मे जो आम लोगों का बोलचाल था

उसी तरह से उन्होंने अपनी रचनाओं में लिखा है उनकी कहानियों का भाषा आत्मकथात्मक वर्णनात्मक भावनात्मक चित्रात्मक प्रतीकात्मक आदि भाषा शैली का उन्होंने भरपूर इस्तेमाल किया है। फणीश्वर नाथ रेणु ने अपने उपन्यासों में कहानियों में आंचलिक भाषा की प्रमुखता दी है।

फणीश्वर नाथ रेणु के मृत्यु

फणीश्वर नाथ रेणु ने जयप्रकाश नारायण के साथ एक आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी उन्होंने सरकार के द्वारा दमन के विरोध में आंदोलन किया और साथ ही पद्मश्री जो सम्मान उन्हें मिला था उसे भी उन्होंने त्याग दिया रेणु जी की कई उपन्यास पर हिंदी फिल्म भी बन चुके हैं

जैसे कि तीसरी कसम फिल्म उन्हीं के द्वारा लिखे गए उपन्यास के ऊपर बना है तीसरी कसम फिल्म में वहीदा रहमान और राज कपूर नायिक और नायक है इस फिल्म को कई पुरस्कार भी मिल चुके हैं।आंचलिक कथाकार और उपन्यासकार फणीश्वर नाथ रेणु का मृत्‍यु 11 अप्रैल 1977 में पटना में ही हुआ था

साराशं 

फणीश्वर नाथ रेणु एक उपन्यासकार आंचलिक कहानीकार थे उन्हें अपने रचनाओं के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया गया था लेकिन बाद में उन्हें भारत रत्न देने के लिए मांग की गई

इस लेख में आंचलिक उपन्यासकार फणीश्वर नाथ रेणु के जीवनी के बारे में पूरी जानकारी दि गई हैं जिसमें उनका जीवन परिचय कैसा था उनका जन्म कहां हुआ

उनके माता पिता कौन थे उनकी विवाह किससे हुआ हुई उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में सहयोग कैसे किया उन्होंने कौन-कौन से रचनाएं की उनका मृत्यु कब हुआ फणीश्वर नाथ रेणु के जीवन परिचय संबंधित कोई सवाल आपके मन में है

तो कृपया कमेंट करके जरूर पूछें हमने इस लेख में आंचलिक उपन्यासकार और कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु के बारे में पूरी जानकारी देेने की कोशिश की है आप लोगों के जनकारी कैसी लगीी हमें कमेंट करके जरूर बताएं शेयर भी जरूर करें।

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