Swami Vivekananda – स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय

स्वामी विवेकानंद वेदांत के विख्यात आध्यात्मिक गुरु माने जाते हैं इस लेख में विवेकानंद जी के जीवन परिचय के बारे में Swami Vivekananda Biography in hindi Language और उनसे जुड़े सभी जानकारी जैसे कि विवेकानंद का जन्म कहां हुआ विवेकानंद ने शिक्षा कौन सी प्राप्त की थी उनके माता पिता कौन थे उनका बचपन कैसे बीता।

स्वामी विवेकानंद को ज्ञान कैसे प्राप्त हुआ उन्होंने विश्व भ्रमण में कौन-कौन से कार्य किए स्वामी विवेकानंद ने किस संस्था का स्थापना किया उसका क्या उद्देश्य था उनका मृत्यु कब हुआ।स्वामी विवेकानंद की ख्याति उनका प्रसिद्धि शिकागो धर्म महासम्मेलन में मेरे भाई एवं बहनों बोलकर लोगों का अभिवादन करने से सबसे ज्यादा मिला है।

उन्होंने विदेश में भी भारतीयों का मान सम्मान बढ़ाया रामकृष्ण मिशन का स्थापना करके कई समाज सुधार कार्य किए गरीबों और पीड़ितों का उन्होंने सहायता किया स्वामी विवेकानंद कई ग्रंथ भी लिखें जिससे कि आगे चलकर युवा पीढ़ी को एक नई राह दिखा सके तो आइए इस लेख में स्वामी विवेकानंद के द्वारा किए गए महान कार्य उनका आध्यात्मिक धार्मिक ज्ञान विश्व दर्शन आदि का विस्तृत रूप से जानकारी प्राप्त करते हैं।

Swami Vivekananda Biography in hindi 

Swami Vivekananda हमारे भारत देश के एक बहुत बड़े सन्यासी समाज सुधारक और एक बहुत बड़े धर्मात्मा थे उन्होंने कोलकाता में रामकृष्ण मिशन का स्थापना किया था उन्होंने यह अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस के सम्मान में बनाया था पहले उन्होंने रामकृष्ण संघ नाम से स्थापना किया था। लेकिन बाद में इसका नाम रामकृष्ण मठ या रामकृष्ण मिशन हो गया।

रामकृष्ण परमहंस Swami Vivekananda के गुरु थे और वह अपने गुरु का बहुत आदर सम्मान करते थे उन्होंने अपने गुरु के आज्ञा से पूरे भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में ज्ञान का प्रचार किया

Swami Vivekananda Biography in hindi Language

उन्होंने सनातन धर्म का प्रचार प्रसार पूरे विश्व में किया। लोगों को सनातन धर्म के बारे में समझाया उन्हें ज्ञान दिया। Swami Vivekananda पूरे विश्व में भारत देश का संस्कृति धर्म और विचार को लोगों के बीच प्रसारित किया

स्वामी विवेकानंद ने विश्व में भारत के धर्म संस्कृति के बारे में लोगों को अवगत कराया और उन्होंने यह एहसास दिलाया कि भारतीय किसी से कम नहीं हैं।वह एक ज्ञान के भंडार हैं

विश्व में लोग भारतीय लोगों को नीचा नहीं समझे उन्होंने शिक्षा का अपने भारत देश में बहुत प्रचार प्रसार किया और लोगों को पढ़ने के लिए लड़के लड़कियों को पढ़ाने के लिए प्रेरित किया।

नाम स्वामी विवेकानंद
वास्‍तविक नाम नरेंद्र दत्त या नरेन
जन्‍म 12 जनवरी 1863
जन्‍म स्‍थान कलकत्‍ता
पिता का नाम विश्वनाथ दत्त
माता का नाम भुवनेश्‍वरी देवी
गुरू रामकृष्‍ण परमहंस
शिष्‍य भगिनी निवेदिता और स्वामी तरियानंद
शिक्षा प्रेसिडेंसी कॉलेज से बीए, अंग्रेजी हिंदी का ज्ञान, रामायण महाभारत श्रीमद्भागवत गीता वेद पुराण आदि धार्मिक किताबों का ज्ञान
कार्यक्षेत्र समाज सुधारक, लेखक, वक्ता, आध्यात्मिक गुरु, सन्यासी
रचनाएं राजयोग,योग,ज्ञान योग,संगीत कल्पतरु,कर्मयोग,वर्तमान भारत उद्बोधन,वेदांता फिलासफी,

Literature from Colombo to almora

प्रसिद्धि शिकागो में विश्व धर्म सम्मेलन
संस्‍थापक रामकृष्ण मिशन,बेलूर मठ,
मृत्‍यु 4 जुलाई 1902

स्वामी विवेकानंद का जन्म 

विवेकानंद कोलकाता के रहने वाले थे उनका जन्म 12 जनवरी 1863 में कलकत्‍ता मे हुआ था। Swami Vivekananda का बचपन का नाम नरेंद्र दत्त था बाद में जब उन्होंने शिक्षा प्राप्त किया तब उनका नाम Swami Vivekananda हो गया

उनके पिताजी का नाम विश्वनाथ दत्त था। Swami Vivekananda के पिता जी कोलकाता के बहुत बड़े वकील थे Swami Vivekananda के माता का नाम भुवनेश्वरी देवी था।

उनकी माता बहुत ही धार्मिक परायण स्त्री थी वह ज्यादा समय पूजा पाठ में ही रहती थी स्वामी विवेकानंद की माता हिंदू धर्म रीति रिवाज संस्कृति इन सब के बारे में स्वामी विवेकानंद को अक्सर बताती रहती थी।

स्वामी विवेकानंद का बचपन 

Swami Vivekananda बचपन से ही अपने घर में धार्मिक माहौल देखा था उनकी माता अक्सर रामायण महाभारत और बहुत सारी धार्मिक किताबें पढ़ा करते थे जब वह उनकी माता पूजा पाठ करती थी धार्मिक किताबें पढ़ती थी

तब स्वामी विवेकानंद भी अपनी माता के पास बैठकर धार्मिक कथा कहानियां सुनते रहते थे और वह बहुत मग्‍न हो जाते थे Swami Vivekananda को यह सब चीज अपनी माता से सुनने में बहुत अच्छा लगता था

वह भक्ति रस में पूरी तरह डूब जाते थे।विवेकानंद बचपन से ही पूजा पाठ और भगवान में पूरी आस्था रखते थे ऐसा कहा जाता हैं कि एक बार वह भगवान का पूजा करते करते ध्यान में इतना मग्‍न हो गए थे कि उनके परिवार वाले बोल रहे थे

लेकिन उन्हें कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था तब अंत में जब किसी ने उन्हें बहुत जोर से बोल कर हिलाया तब जाकर उनका ध्यान टूटा उन्हें भगवान में बहुत आस्था था।

स्वामी विवेकानंद का शिक्षा  

Swami Vivekananda का शुरुआत पढ़ाई कोलकाता में ही हुआ था उनके पिताजी चाहते थे की अंग्रेजी हिंदी का ज्ञान उन्हें प्राप्त हो लेकिन स्वामी विवेकानंद को अंग्रेजी विषय में कोई रुचि नहीं था

वह अंग्रेजी नहीं पढ़ना चाहते थे। शुरू में उन्होंने प्रेसिडेंसी कॉलेज में एडमिशन कराया था लेकिन बाद में उन्होंने किसी और कॉलेज से b.a. किया। स्वामी विवेकानंद बचपन से ही पढ़ने में बहुत तेज थे।

उन्हें हिंदी अंग्रेजी बांग्ला आदि भाषाओं का बहुत ज्ञान था।उनका को बचपन से ही रामायण महाभारत श्रीमद्भागवत गीता वेद पुराण आदि धार्मिक किताबें पढ़ने में बहुत मन लगता था।

उन्होंने इन सब किताबों का बहुत अच्छे से अध्ययन भी किया था उन्हें शास्त्रीय संगीत में भी बहुत रुचि था वह अपने स्कूल में खेलकूद व्यायाम इन सारी चीजों में बहुत खुशी से और मन लगाकर भाग लेते थे Swami Vivekananda अपने स्कूल में एक बहुत ही होनहार छात्र थे।

स्वामी विवेकानंद के गुरु कौन थे 

स्वामी विवेकानंद ने जब b.a. की पढ़ाई पूरी कर ली उसके बाद उनके पिताजी उनका विवाह कराना चाहते थे लेकिन उन्होंने साफ मना कर दिया कि वह विवाह नहीं करना चाहते हैं।

उन्हें सन्यासी जीवन जीना हैं उन्हें बहुत सारा ज्ञान प्राप्त करना हैं 25 साल के उम्र में ही Swami Vivekananda अपने घर को छोड़ दिए थे और सन्यासी हो गए थे उन्होंने ज्ञान प्राप्त करने के लिए ब्रह्म समाज के नेता देवेंद्रनाथ ठाकुर के पास गए।

swami vivekananda को वहां भी मन को शांति नहीं मिला वह जितना चाहते थे उतना ज्ञान उन्हें प्राप्त नहीं हुआ इसलिए देवेंद्र नाथ ठाकुर ने रामकृष्ण परमहंस के पास जाने के लिए बोला उसके बाद स्वामी विवेकानंद रामकृष्ण परमहंस के पास चले गए।

रामकृष्ण परमहंस कोलकाता के दक्षिणेश्वर काली मंदिर के बहुत बड़े पुजारी और मां काली के बहुत बड़े भक्त थे। जब Swami Vivekananda रामकृष्ण परमहंस के पास गए

उनसे ज्ञान प्राप्त किया और रामकृष्ण परमहंस को उन्होंने अपना गुरु बना लिया स्वामी विवेकानंद वही रामकृष्ण परमहंस के साथ रहने लगे और उनका आदर सम्मान करने लगे वह अपने गुरु की बहुत सेवा करते थे।

स्वामी विवेकानंद का व्यक्तित्व 

Swami Vivekananda हिंदू रीति-रिवाजों धर्म संस्कृति आदि मानने वाले बहुत बड़े सन्यासी और काली मां के भक्त थे उन्होंने भारतीय धर्म साहित्य और रीति-रिवाजों को विश्व में फैलाने का बहुत बड़ा कार्य किया हैं

Swami Vivekananda अपने गुरु की बहुत सेवा किया करते थे ऐसा कहा जाता हैं कि रामकृष्ण परमहंस को कैंसर हो गया था इस वजह से उनकी हालत बहुत खराब हो गई थी और वह अंत समय में बिस्‍तर पर पड़ गए थे

उनके शरीर से में घाव हो गया था। swami vivekananda उनकी बहुत सेवा किया करते थे कहा जाता हैं कि एक बार Swami Vivekananda ने देखा कि कुछ उनकी तरह ही रामकृष्ण परमहंस के शिष्य थे

अपने गुरु से घृणा कर रहे थे क्योंकि उनके घाव से मवाद गिर रहा था इसलिए उनके शिष्य उनसे घृणा कर रहे थे और उनके पास नहीं जा रहा थे तब Swami Vivekananda अपने गुरु के पास गए

उन्होंने अपने दोस्तों को भी बहुत डांटा उनको दिखाने के लिए कि तुम लोग जिस से घृणा कर रहे हो मैं उनका कितना सम्मान करता हूं आदर करता हूं उन्होंने अपने गुरु का थुका हुआ था उसे उठाकर पी गए।

उन्‍होंने यह बताया कि किसी के जीवन में अब क्या होगा कोई नहीं जान सकता हैं इसलिए किसी के शरीर से घृणा मत करो सभी  का आदर्श सम्मान करो अपने गुरु का सम्मान करो।

स्वामी विवेकानंद का विश्‍व का पैदल यात्रा

Swami Vivekananda जब ज्ञान प्राप्त कर लिया तब भारतीय धर्म संस्कृति का प्रचार प्रसार करने लगे उन्होंने पैदल ही भारत का भ्रमण करना शुरू कर दिया स्वामी विवेकानंद कश्मीर से कन्याकुमारी तक पूरे भारत में पैदल ही भ्रमण करने लगे।

और इस दौरान उन्होंने बहुत सारे लोगों की समस्याएं देखी और गरीब लोगों को खाने के लिए तरसते हुए देखा और इस चीज का बहुत प्रभाव पड़ा। Swami Vivekananda रामकृष्ण परमहंस से जब ज्ञान प्राप्त किये उससे पहले वह एक बहुत ही साधारण इंसान थे

लेकिन जब उन्होंने अपने गुरु से ज्ञान प्राप्त किया तब वह एक सन्यासी और एक युगपुरुष बन गए उनका नाम नरेंद्र दत्त था लेकिन रामकृष्ण परमहंस से ज्ञान प्राप्त करने के बाद उनके शिष्य बनने के बाद स्वामी विवेकानंद बन गए और विश्व में उन्होंने अपने ज्ञान के प्रकाश को फैलाना शुरू कर दिया।

स्वामी विवेकानंद का शिकागो में विश्व धर्म सम्मेलन

एक बार अमेरिका के शिकागो में विश्व धर्म सम्मेलन हो रहा था उसमें Swami Vivekananda भाग लेने के लिए गए थे लेकिन पहले भारतीयों को विदेशों के लोग साधारण जानते थे

उन्हें लगता था कि भारतीय अज्ञानी हैं उन्हें किसी भी चीज का ज्ञान नहीं हैं और वह दास हैं क्योंकि उस समय भारत अंग्रेजों का गुलाम था इस वजह से विदेशों में भारतीयों के कोई कदर नहीं होती थी।

11 सितंबर 1893 में जब शिकागो में विश्व धर्म सम्मेलन चल रहा था तो Swami Vivekananda ने भी उस में भाग लिया जब वह स्टेज पर गए तो उन्हें कुछ समय का वक्त दिया गया था।

उन्हें भाषण देने के लिए लेकिन जब उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत किया और कहा मेरे अमेरिकी भाई और बहनों यह सुनकर वहां पर मौजूद सभी लोग इतने खुश हुए और वहां तालियों की गड़गड़ाहट से बहुत देर तक गूंजता रहा।

उसमें स्वामी विवेकानंद ने भारत के सनातन धर्म संस्कृति का व्याख्या किया और अपना विचार भी रखा इस भाषण से Swami Vivekananda विश्व में बहुत प्रसिद्ध हो गए और लोग उन्हें स्वामी जी कहके बहुत आदर भी करने लगे

इस धर्म सम्मेलन के बाद स्वामी विवेकानंद ब्रिटेन में वेदांत शिक्षा का बहुत प्रचार किया और वह 3 साल तक रह कर भारतीय संस्कृति और धर्म को प्रचलित किया और प्रसार दिया। 15 अगस्त 1897 में स्वामी विवेकानंद घूमते घूमते श्रीलंका पहुंच गए वहां पर भी उन्हें बहुत आदर और सम्मान मिला।

स्वामी विवेकानंद का चचर्ति प्रसंग

जब Swami Vivekananda का प्रचार प्रसार पूरे विश्व में फैला हुआ था तब उनकी ख्याति सुनकर एक विदेशी महिला उनसे मिलने आई थी उसने Swami Vivekananda से कहा कि मैं आपसे शादी करना चाहती हूं

तब स्वामी विवेकानंद ने कहा कि हे देवी मैं तो एक ब्रह्मचारी हूं तो मैं आपसे शादी नहीं कर सकता हूं। वह विदेशी महिला स्वामी विवेकानंद से शादी इसलिए करना चाहती थी

क्योंकि वह चाहती थी कि स्वामी विवेकानंद जी जैसा ही उसे भी महाज्ञानी और धार्मिक पुत्र पैदा हो जो कि पूरे विश्व में अपने ज्ञान का प्रकाश फैला सके

तब Swami Vivekananda ने उस महिला को नमस्कार करके उसे मां कहा और कहा कि अब तो मैंने आपको मां कह दिया आप मां बन गई और मैं आपका पुत्र बन गया

इससे मेरा ब्रह्मचर्य का व्रत भी नहीं टूट पाएगा और आप मां भी बन गई यह सुनकर वह विदेशी महिला Swami Vivekananda जी से बहुत प्रभावित हुई और स्वामी विवेकानंद को प्रणाम करके उनके पैरों में गिर गई

उसने कहा कि मैंने जो भी किया उसे माफ कीजिएगा। Swami Vivekananda को शिकागो के विश्व धर्म महासभा से ही लोग बहुत जानने लगे थे। और यह बात हमारी इतिहास के पन्नों में आज भी अंकित हैं।

रामकृष्ण मिशन की स्थापना

Swami Vivekananda के गुरु रामकृष्ण परमहंस का जब मृत्यु हो गया तब स्वामी विवेकानंद ने 1885 ईसवी में रामकृष्ण मिशन का स्थापना किया

उन्होंने इस मिशन का स्थापना अपने गुरु के आदर और सम्मान में किया था क्योंकि वह अपने गुरु का बहुत सम्मान करते थे अपने गुरु को भगवान का दर्जा देते थे।

स्वामी विवेकानंद के द्वारा रामकृष्ण मिशन का स्थापना करने का उद्देश्य भारत के लोगों का विकास करना था भारत का निर्माण करना था

उन्होंने रामकृष्ण मिशन का स्थापना करके कई अस्पताल कॉलेज स्कूल और कई जगहों पर साफ सफाई करने के क्षेत्र में कार्य किया 1898 में बेलूर मठ की स्थापना स्वामी विवेकानंद ने किया

स्वामी विवेकानंद के विचार 

Swami Vivekananda शिक्षा के लिए लोगों को बहुत जागृत करते थे उनका कहना था कि शिक्षा ही लोगों के चरित्र का निर्माण करता हैं शिक्षा से ही पता चलता हैं कि वह व्यक्ति कैसा हैं क्योंकि जिसके पास शिक्षा हैं

उसका अपना तो विकास होगा ही दूसरों का भी विकास करेगा और अपने पैरों पर खुद खड़ा हो पाएगा सक्षम बनेगा विवेकानंद का कहना था की अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए तब तक मत रुको जब तक तुम्हारा लक्ष्य प्राप्त ना हो जाए उठो अपना लक्ष्य प्राप्त करो और दूसरों को भी लक्ष्य प्राप्त करने के लिए प्रेरित करो।

उन्होंने शिक्षा के विषय में लोगों को बताया कि बच्चे का सही विकास और शिक्षा घर से ही प्राप्त हो सकता हैं अपने बच्चे को ऐसा बनाओ जिससे कि उसके बुद्धि तो विकसित हुई वह बच्चा अपने आप आत्मनिर्भर बने।

Swami Vivekananda लड़के और लड़की दोनों को समान शिक्षा देने के बारे में कहा उन्होंने कहा कि शिक्षा पुस्तकों से नहीं मिलती हैं बल्कि उनका सही आचरण और संस्कार सही होना चाहिए।

स्वामी विवेकानंद के विचार

उन्होंने कहा की धर्म का ज्ञान और किताबी ज्ञान दोनों प्राप्त करना चाहिए Swami Vivekananda बताया कि शिक्षा गुरु से और घर पर दोनों से प्राप्त होता हैं

Swami Vivekananda शिक्षक और छात्र को एकदम नजदीक रहने के लिए कहा था ताकि ज्ञान अच्छे से प्राप्त हो सके। स्वामी विवेकानंद अपनी मातृभाषा का बहुत सम्मान करते थे

वह हिंदी भाषा को बहुत पसंद और आदर भी करते थे ऐसा कहा जाता हैं कि एक बार जब वह कहीं विदेश घूमने गए थे तब वहां लोगों ने स्वामी विवेकानंद का हेलो कहके हाथ बढ़ाया

तब स्वामी विवेकानंद ने दोनों हाथ जोड़कर नमस्कार किया वहां के लोगों को यह लगा कि स्वामी विवेकानंद को इंग्लिश नहीं आता हैं तो उन्होंने हिंदी में ही स्वामी विवेकानंद से पूछा कि आप कैसे हैं

तब स्वामी विवेकानंद ने कहा कि आई एम फाइन थैंक यू यह सुनकर वहां के लोग आश्चर्यचकित हो गए तब Swami Vivekananda ने उन्हें समझाया कि मैं अपने मां का सम्मान करता हूं

जब आप लोग इंग्लिश बोल कर अपने मातृभाषा का सम्मान कर रहे थे तब मैंने हिंदी बोल कर अपने मातृभाषा का सम्मान किया और जब आप लोगों ने हिंदी बोलकर मेरी मातृभाषा का सम्मान किया तब मैंने इंग्लिश बोलकर आपकी मातृभाषा को सम्मान दिया

अपनी मां का सम्मान हमेशा करना चाहिए जिस को इंग्लिश नहीं आता हैं उसे किसी के सामने शर्मिंदा नहीं होना चाहिए क्योंकि हिंदी हमारी मातृभाषा हैं हमें हिंदी को मां की तरह सम्मान करना चाहिए। हमें हिंदी बोलने पर गर्व करना चाहिए।

स्वामी विवेकानंद का दोबारा विदेश यात्रा

1893 में शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन में अपने भाषण से लोगों के बीच में स्वामी विवेकानंद बहुत प्रसिद्ध हो गए उन्होंने उस धर्म सम्मेलन में श्रीमद्भागवत गीता जब रखा तो वहां के जो भी धर्म गुरु थे

उन्होंने उनका बहुत मजाक उड़ाया लेकिन जब स्वामी विवेकानंद ने अपना भाषण शुरू किया उसके बाद वहां तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी थी स्वामी विवेकानंद ने अपना दूसरा विदेश यात्रा 20 जून 1899 में किया था

जिसमें उन्होंने न्यूयॉर्क में वेदांत सोसाइटी का स्थापना किया कैलिफोर्निया में शांति आश्रम का स्थापना करके भारतीय संस्कृति का कैलिफोर्निया और न्यूयॉर्क में भी प्रचारित प्रसारित किया

विवेकानंद विदेश यात्रा करते करते 1900 में पेरिस गए वहां पर कांग्रेश अवधि हिस्ट्री रिलीजियंस में शामिल हुए जहां पर उनके दो शिष्‍य बने भगिनी निवेदिता और स्वामी तरियानंद।

पेरिस में स्वामी विवेकानंद ने 3 महीना तक समय व्यतीत किया उसके बाद भारत लौट आए और आगे भी उन्होंने कई जगहों पर यात्राएं किया बोधगया और वाराणसी में भी उन्होंने अपना धार्मिक यात्रा किया था।

स्वामी विवेकानंद का योगदान

39 वर्ष की छोटी उम्र में ही स्वामी विवेकानंद ने अपनी ख्याति और प्रसिद्धि पूरे विश्व में प्राप्त कर ली थी उन्होंने 39 साल की उम्र में ही कई ऐसे महान कार्य किए जिनसे सदियों तक युवा पीढ़ी प्रभावित और मार्गदर्शित होते रहेंगे

अमेरिका के विश्व धर्म सम्मेलन में उन्होंने भारत की संस्कृति भारत की वेद ग्रंथ आदि का प्रचार प्रसार किया उन्होंने हिंदू धर्म का प्रचार किया एक अलग पहचान बनाया

उनके इन्हीं ख्याति की वजह से रविंद्र नाथ टैगोर ने एक बार कहा था कि अगर भारत की संस्कृति के बारे में भारत के बारे में जानना है तो विवेकानंद के बारे में पढ़ ले स्वामी विवेकानंद सिर्फ एक सन्यासी नहीं थे

बल्कि वह एक सच्चे देशभक्त थे एक लेखक थे बहुत ही अच्छे वक्ता थे विचारक थे उनमें कई महान गुण थे भारतीय स्वाधीनता संग्राम में स्वामी विवेकानंद के विचारों से कई लोग प्रभावित हुए थे

उन्होंने अपने देशवासियों को अंग्रेजों से लड़ने के लिए आव्‍हान किया जिसमें उन्होंने कहा कि नया भारत निकल पड़े मोची की दुकान से भडभूंजा के भार से करखाने से हट से बाजार से निकल पड़े झाड़ियों जंगलों पहाड़ों पर्वतों से

उनके इस अव्‍हान से भारत वासियों में एक अलग जोश आ गया और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में कई लोगों ने स्वामी विवेकानंद से प्रेरित होकर योगदान दिया।

विवेकानंद का मानना था कि भारत एक पवित्र पुण्य भूमि है भारतवर्ष की भूमि पर कई महान महात्मा और ऋषि मुनियों का जन्म हुआ है यह धरती त्याग की भूमि है

उनका विचार था कि उठो जागो स्वयं जाकर औरों को जगाओ अपने जन्म को सफल करो तब तक नहीं रुको जब तक कि लक्ष्य प्राप्त न हो जाए स्वामी विवेकानंद ने भारतीय एकता का महत्व दिया था।

स्वामी विवेकानंद की रचनाएं

आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त हो जाने के बाद स्वामी विवेकानंद गेरुआ वस्त्र पहन के देश विदेश में भारतीय संस्कृति को प्रचारित प्रसारित किया स्वामी विवेकानंद को साहित्य इतिहास और दर्शन के प्रकांड पंडित के रूप में जाने जाते है

इसके साथ ही उन्होंने भारत के युवाओं को नई राह दिखाने के लिए सही दिशा दिखाने के लिए कई ग्रंथ भी लिखें जिससे युगो युगो तक भारत के जनमानस पढ़कर के हमेशा सही राह पर चले

उन्होंने अपने आध्यात्मिक चिंतन और दर्शन से लोगों को एक प्रेरणा दिया साथ ही भारत की सभ्यता और संस्कृति को पूरे विश्व में बिखेरने में सफल रहे उनका मानना था कि जैसा कोई आज कर्म करेगा कल उसको वैसा ही फल मिलेगा

उन्होंने लोगों को समझाया कि अगर किसी को लक्ष्य हासिल करना है तो उसके लिए हमेशा कोशिश करते रहना चाहिए स्वामी विवेकानंद के द्वारा लिखे गए कई ग्रंथ है जैसे कि

  • राजयोग
  • योग
  • ज्ञान योग
  • संगीत कल्पतरु
  • कर्मयोग
  • वर्तमान भारत उद्बोधन
  • वेदांता फिलासफी
  • Literature from Colombo to almora

यह सारे ग्रंथ स्वामी विवेकानंद के जीवन काल में ही प्रकाशित हुए थे लेकिन कुछ ऐसे भी ग्रंथ है जो कि उनके मरने के बाद प्रकाशित हुए जिनका नाम इस प्रकार है

  • भक्ति योग
  • Inspired talk
  • Addresses on bhakti yoga
  • Practical Vedanta
  • The east and the west
  • Para bhakti of supreme devotion

स्वामी विवेकानंद का मृत्यु 

विवेकानंद ने रामकृष्ण मिशन का स्थापना किया जो कि बाद में रामकृष्ण मठ के नाम से प्रचलित हुआ उसी में वह बहुत सारे अपने शिष्यों को वेद संस्कृति और योग का शिक्षा दिया करते थे।

4 जुलाई 1902 को भी रोज की तरह अपने छात्र शिष्यों को पढ़ाने के बाद अपने कमरे में चले गए और उन्होंने अपने शिष्यों से कहा कि वह योगा करने जा रहे हैं इसलिए उन्हें कोई उनके योगा में भंग नहीं करेगा और योगा करते समय ही उनकी मृत्यु हो गई।

Swami Vivekananda की मृत्यु हुई तो उनकी उम्र 39 वर्ष थी। 39 वर्ष के एक छोटे से उम्र में ही स्वामी विवेकानंद ने अपनी ज्ञान की ज्योति पूरे विश्व में फैला दिया था वह बहुत ही बड़े सन्यासी महात्मा ज्ञानी पुरुष थे स्वामी विवेकानंद के जन्म दिन को उनके सम्मान में हम लोग युवा दिवस के रूप में मनाते हैं। ‌

सारांश

स्वामी विवेकानंद  अपने भारत को भविष्य में एक ऐसे समाज का कल्पना किया था जिसमें सब धर्म के सब जाति के लोग एक साथ बिना किसी भेदभाव के रहेंगे उनका मानना था कि शिक्षा ऐसा प्राप्त करना चाहिए

जिससे कि किसी भी बालक के मानसिक शारीरिक एवं आध्यात्मिक विकास हो जिससे किसी भी बालक के चरित्र का निर्माण हो उसका बुद्धि विकसित हो वह अपने आप में आत्मनिर्भर बने शिक्षा लड़के और लड़कियों दोनों को बराबर देना चाहिए

इसके साथ ही धार्मिक शिक्षा आचरण एवं संस्कार का भी शिक्षा देना चाहिए।इस लेख में एक समाज सुधारक लेखक वक्ता आध्यात्मिक गुरु सन्यासी स्वामी विवेकानंद के बारे में पूरी जानकारी दी गई है

जिसमें उनका जन्म कहां हुआ उन्होंने शिक्षा कहां से प्राप्त किया स्वामी विवेकानंद का बचपन कैसे बीता उन्हें ज्ञान कैसे प्राप्त हुआ स्वामी विवेकानंद के गुरु कौन थे

भारत के संस्कृति का प्रचार-प्रसार उन्होंने कहां कहां और कैसे किया।इस लेख से संबंधित कोई सवाल मन में है तो कृपया कमेंट करके जरूर पूछें औरयह लेख कैसा लगा हमें कमेंट करके जरूर बताएं और शेयर भी जरूर।

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