Vidyapati – महाकवि विद्यापति ठाकुर का जीवन परिचय

भारतीय हिंदी साहित्य में श्रृंगार रस और भक्ति रस की परंपरा को एक बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान और प्रसिद्ध करने वाले महाकवि विद्यापति ठाकुर थे

विद्यापति के बारे में जानने के लिए उनकी रचनाओं को विस्तृत रूप से जानने के लिए इस लेख को पूरा जरूर पढ़ें।

इस लेख में जानने वाले हैं कि Vidyapati in hindi कौन थे  विद्यापति का जन्म कहां हुआ वह कहां के रहने वाले थे उनका व्यक्तित्व कैसा था उनका जीवन कैसा था इसके बारे में हम  यहां जानेंगे आइए जानते हैं कि विद्यापति जी कौन थे।

Vidyapati in hindi

विद्यापति भक्ति परंपरा के एक बहुत बड़े कवि और लेखक थे विद्यापति ठाकुर मिथिलांचल से थे और मैथिली भाषा के बहुत ही बड़े प्रसिद्ध कवि थे इसलिए उन्हें मैथिली कवि कोकिल कहा जाता है मैथिली कवि कोकिल का अर्थ मैथिली के कवि कोयल होता है यानी कि जब भी वह गाते थे तो कोयल की तरह उनकी आवाज लोगों को पसंद आती थे

विद्यापति एक बहुत ही बड़े संगीतकार लेखक मैथिली और संस्कृत के कवि और एक राजपुरोहित थे भगवान शिव की अनन्य उपासक एवं भक्त थे लेकिन उनकी रचनाओं में राधा कृष्ण के प्रेम भक्ति और सौंदर्य का झलक दिखाई देता है

Vidyapati in hindi

विद्यापति सिर्फ मैथिली और संस्कृत में ही अपनी रचनाएं नहीं लिखते थे बल्कि और भी कई भाषाओं के भी वह जानकार थे भारतीय हिंदी साहित्य में जो भक्ति परंपरा और श्रृंगार परंपरा का उद्भव हुआ उसमें विद्यापति का महत्वपूर्ण स्थान आता है और इन्हें एक महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में माना जाता है

भले ही वह शिव भक्त थे लेकिन इन्होंने अपनी बहुत सारी रचनाएं कृष्ण भक्ति में लिखे हैं पदावली और कृति लता विद्यापति का सबसे प्रसिद्ध रचना है और यह रचना अमर हो गई है इसे आज भी लोग उतने ही प्रेम से पढ़ते हैं और आगे भी लोग पसंद करते रहेंगे

उन्होंने अपनी रचनाएं शिव दुर्गा शक्ति आदि के संबंध में भी किए हैं लेकिन सबसे ज्यादा राधा कृष्ण को नायक और नायिका बनाकर के अपने रचनाओं में श्रृंगार रस का वर्णन किया है मिथिला के राजा शिव सिंह विद्यापति के बचपन के दोस्त थे

इसीलिए जब शिव सिंह राजा बने तब वह विद्यापति को अपने दरबार में कवि के रूप में रहने के लिए स्थान दिया विद्यापति ठाकुर राजा शिव सिंह के दरबारी कवि थे वहां बचपन से ही अपने पिता के साथ जाया करते थे।

 

विद्यापति‍ का जन्‍म 

भक्ति काल के कई कभी हुए  जैसे कि सूरदास तुलसीदास मीरा कबीर दास इन सारे महान कवियों से पहले के कवि विद्यापति ठाकुर थे।  वैसे तो इन के जन्म के बारे में कोई साक्ष्य प्रमाण नहीं है किसी तरह का प्रमाणिकता नहीं है

फिर भी 1350 से 1374 के बीच विद्यापति के जन्म के बारे में कहा जाता है उनका जन्म बिहार के दरभंगा जिला के विसपी ग्राम में हुआ था विद्यापति जी का जन्‍म एक   ब्राह्मण परिवार में हुआ था उनके पिता का नाम गजपति ठाकुर था

विद्यापति के माता का नाम हांसिनी देवी था।विद्यापति के पिताजी श्री गणपति ठाकुर भगवान शिव के बहुत बड़े भक्त थे विद्यापति बचपन से ही बहुत ही समझदार और तेज बुद्धि के बालक थे जब वह छोटे थे तभी अपने पिताजी के साथ राजा शिव सिंह के दरबार में जाया करते थे

उस समय शिव सिंह के पिताजी राजा थे शिव सिंह और विद्यापति बहुत अच्छे मित्र थे जब विद्यापति बड़े हुए और राजा शिव सिंह उस राज्य के सिंहासन पर बैठे तब उन्होंने विद्यापति को अपने दरबारी का भी बना लिया।

विद्यापति जी की शिक्षा

उनके पिताजी संस्कृत के उच्च कोटि के विद्वान थे विद्यापति जी के पिताजी विद्वान और कवि थे विद्याध्‍ययन एवं लेखन का संस्कार उन्हें अपने परिवार से ही मिला था विद्यापति का पुरा नाम विद्यापति ठाकुर था।विद्यापति जी संस्कृत प्राकृत अपभ्रंश मातभाषा मैथिली पर बहुत ही अच्छेे से जानते था

विद्यापति के परिवारिक जीवन

महाकवि विद्यापति ठाकुर के परिवारिक जीवन का कोई लिखित प्रमाण नहीं है लेकिन मिथिला के लोगों से पता चलता है कि उनके दो विवाह हुए थे प्रथम पत्नी से 2 पुत्र थे जिनका नाम नरपति और हर पति था

और दूसरी पत्नी से उनके एक पुत्र और एक पुत्री हुए पुत्र का नाम बचस्पति ठाकुर था और पुत्री का नाम दूल्लहि पाया जाता है जिसका उल्‍लेख उनके रचित एक कविता में भी मिलता है ऐसा माना जाता है कि विद्यापति जी का वंशज वर्तमान समय में सौराठ गांव जोकि मधुबनी में स्थित है में निवास करते हैं।

नाम विद्यापति ठाकुर
जन्‍म 1350 से 1374 के बीच
पिता का नाम गणपति ठाकुर
माता का नाम हांसिनी देवी
मृत्‍यु कोई प्रमाण नहीं
प्रमुख रचनाएं कृति लता

विद्यापति पदावली

भूप परिक्रमा

विद्यापति का भाषा मैथिली,संस्‍कृत और अपभ्रंश

विद्यापति का व्यक्तित्व

विद्यापति भारतीय साहित्य के भक्ति परंपरा के प्रमुख कवि थे विद्यापति विख्यात मैथिली कोकिला कवि कहलाते थे मैथिली भाषा के सर्वश्रेष्ठ कवि माने जाते थे उनका संस्कृत प्राकृत अपभ्रंश मातभाषा मैथिली पर बहुत ही अच्छा ज्ञान था विद्यावती की रचनाएं अक्सर संस्कृत अवहट्ठ और मैथिली तीनों भाषाओं में पाई जाती है।

विद्यापति एक ऐसे महान कवि थे जिन्हें संस्कृत मैथिली भाषा के साथ-साथ और भी कई भाषाओं का भी ज्ञान था साथ ही उन्हें ज्योतिष इतिहास साहित्य संगीत भूगोल दर्शन आदि का जानकारी था

उन्होंने संस्कृत अपभ्रंश मैथिली भाषा में अपनी रचनाएं की थी जो भी विद्यापति की रचनाएं हैं उनमें भगवान श्री कृष्ण और राधा जी को नायिका बनाकर के श्रृंगार रस का वर्णन किया गया है उनकी रचनाओं में काव्य प्रेम सौंदर्य की झलक दिखाई देती है

विद्यापति ने कई देवी-देवताओं के स्तुति भी लिखे हुए प्राकृतिक सौंदर्य का भी कई अपनी रचनाओं में वर्णन किया है विद्यापति ठाकुर के रचनाओं की और उनके जीवन के बारे में कई लेखक और कवियों ने वर्णन किया है

जैसे कि हजारी प्रसाद द्विवेदी ने विद्यापति ठाकुर के द्वारा रचित सबसे प्रसिद्ध और महान रचना कृति लता को भृंग भृंगी संवाद माना है। विद्यापति ने सबसे पहले कीर्ति लता जैसी महान रचना की थी कृति लता आहट्ट भाषा में लिखा गया है।

विद्यापति  की रचनाएं 

विद्यापति मीरा सूरदास तुलसीदास कबीर आदि सभी कवि के पहले के कवि हैं हिंदी साहित्य में विद्यापति का स्थान हिंदी साहित्य में स्थान और महत्व प्रथम गीतकार के रूप में पाया जाता है विद्यापति जी राधा और कृष्ण के प्रेम भरे गीतों की बहुत सारी रचनाएं की है आसाम बंगाल उड़ीसा पटना में भी यह बहुत ही प्रसिद्ध है

वह मिथिलांचल के रहने वाले थे इसलिए उन्हें मैथिली कवि कहा जाता था 14वीं 15वीं शताब्‍दी में राधा कृष्ण के प्रेम के बारे में उन्होंने बहुत सारे वर्णन किए अपनी रचनाओं में कृष्ण भक्ति के बारे में उन्होंने बहुत सारी वर्णन किया हैं विद्यापति प्रेम सौन्‍दर्य और भक्ति के अप्रतिम गायक थे ।

विद्यापति कुछ प्रमुख रचनाएं की रचनाएं

विद्यापति ने बहुत सारी रचनाएं की लेकिन उसमें प्रमुख कुछ रचनाएं हैं जैसे कि

  • कृति लता
  • विद्यापति पदावली
  • भूप परिक्रमा
  • पुरुष परीक्षा
  • लिखनावली
  • शैवसिद्धांतसार
  • गंगा वाक्‍यावली
  • विभाग सार
  • दान वाक्‍यावली
  •  दुर्गा तरंगिनी

के नाम अधिकतर लिए जाते हैं उनके कृति का आधार सबसे ज्यादा विद्यापति पदावली ही थी जिसमें 387 पद संकलित है। महाकवि विद्यापति ठाकुर ने अनेक राजवंश राजाओं के शासनकाल में रहकर अपने दूरदर्शिता का मार्गदर्शन किया था

जिन राजाओ के यहां महाकवि ने सम्मान रखा उनमें प्रमुख है देव सिंह कीर्ति सिंह शिव सिंह पदम सिहं नरसिंह धीरसिंह भैरवसिंह चंन्‍द्रसिंह इत्‍यादि राजाओं का उल्लेख मिलता है।

विद्यापति का मृत्यु

जिस तरह महाकवि विद्यापति के जन्म के बारे में मतभेद है कोई साक्ष्य प्रमाण नहीं है उसी तरह उनके मृत्यु के बारे में भी कोई प्रामाणिकता नहीं मिलता है कहा जाता है कि बिहार के बेगूसराय जिला के विद्यापति नगर के पास ही गंगा नदी के किनारे उन्होंने अपना प्राण त्याग दिया था

उनकी मृत्यु 1440 इसवी माना जाता है लेकिन कुछ विद्वानों का मानना है कि 1446 में विद्यापति का मृत्यु हुआ था।

साराशं 

भक्ति काल के महान कवि संगीतकार दरबारी कवि भक्त कवि श्रृंगारी कवि के रूप में महाकवि विद्यापति ठाकुर को सम्मान दिया जाता है और वह मैथिली कोकिल नाम से भी प्रसिद्ध है

वह मैथिली और संस्कृत के बहुत बड़े कवि थे इस लेख में मैथिली कोकिल महाकवि विद्यापति ठाकुर के बारे में पूरी जानकारी दी गई है जिसमें विद्यापति का जन्म कहां हुआ उनका जीवन परिचय क्या है

विद्यापति का परिवारिक जीवन कैसा था उनका व्यक्तित्व कैसा था विद्यापति ने कौन-कौन सी रचनाएं लिखी थी के बारे में पूरी जानकारी दी गई है।

विद्यापति के बारे में हमने यहां पर पूरा  परिचय बताने का कोशिश किये हैं आप लोगों को कैसा लगा कृपया कमेंट करके अपना राय जरूर बताएं और अपने दोस्तों रिश्तेदारों और मित्रों को भी शेयर जरूर करें

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