अहंकारी व्यक्ति को पद मिलने पर उसका अहंकार और बढ़ जाता है : श्री जीयर स्वामी जी

अहंकारी व्यक्ति को पद मिलने पर उसका अहंकार और बढ़ जाता है : श्री जीयर स्वामी जी महाराज – परमानपुर चातुर्मास्य व्रत स्थल पर भारत के महान मनीषी संत श्री लक्ष्मी प्रपन्‍न जीयर स्वामी जी महाराज ने कहा कि राजा दक्ष को प्रजापतियों का प्रजापति नियुक्त किया गया। उसके बाद उनके लिए प्रयागराज में एक अभिनंदन समारोह आयोजित किया गया। उस समारोह में बड़े-बड़े संत महात्मा देवता शामिल होने के लिए आए थे। उस सभा में भगवान विष्णु, ब्रह्मा जी भी पहुंचे थे। राजा दक्ष की 14वीं सबसे छोटी पुत्री का विवाह शंकर जी के साथ हुआ था। जब राजा दक्ष प्रजापतियों के प्रजापति बने तब उनके विचार, आचरण, अहंकार से डूब गए।

अहंकारी व्यक्ति को पद मिलने पर उसका अहंकार और बढ़ जाता है

देखिए किसी अहंकारी व्यक्ति को पद मिलने से उसका व्यवहार, आचरण, बोलचाल बदल जाता है। प्रयागराज में आयोजित सभा में जब प्रजापति राजा दक्ष के दामाद शिवजी पहुंचते हैं, तब शिवजी भगवान विष्णु को प्रणाम करते हैं। उस सभा में हजारों हजार की संख्या में लोग उपस्थित थे। शंकर जी अपने ससुर प्रजापति दक्ष को मन ही मन प्रणाम कर लेते हैं। बताया गया है कि जब किसी बड़े आयोजन में हजारों हजार की संख्या में लोग उपस्थित हो, उस समय सभा में सबसे जो वरिष्ठ व्यक्ति होता है, उसको यदि नमस्कार कर लिया जाता है तो पूरे सभा में मौजूद सभी लोगों को एक-एक करके नमस्कार करने की आवश्यकता नहीं है। 

क्योंकि यदि एक-एक व्यक्ति को नमस्कार किया जाए तो सभा में अव्यवस्था फैल सकती है। इसी बात को सोचते हुए शंकर जी अपने ससुर को मन ही मन प्रणाम कर लिए। अब इस बात को लेकर के प्रजापति दक्ष जो अभिनंदन समारोह के मुख्य अगुआ थे, जिनको अभी-अभी प्रजापतियों का प्रजापति बनाया गया था, वह अहंकार से क्रोधित हो गए। भरी सभा में शंकर जी को अपशब्द कहने लगे।

ahankari adami ko pad milane par ahankar badh jata hai

गाली गलौज के साथ अपमानित करने लगे। शंकर जी सभा में चुपचाप बैठे हुए थे। शंकर जी के साथ गए उनके गण शंकर जी से कह रहे थे कि महाराज आज्ञा दीजिए हम लोगों से बर्दाश्त नहीं हो रहा है। इस प्रकार से राजा दक्ष आपको बेइज्जत कर रहे हैं। हम लोग इनको छोड़ेंगे नहीं। 

प्रजापति दक्ष शंकर जी को अपमानित करने के लिए बड़े यज्ञ का आयोजन शुरू किए

शंकर जी कह रहे थे कि नहीं-नहीं आप लोग शांत बैठिए। वह हमारे ससुर हैं, बड़े हैं, आदरणीय हैं, बोलने दीजिए उनको। लेकिन प्रजापति राजा दक्ष फिर भी चुप नहीं हो रहे थे। अंत में शंकर जी के गण  क्रोधित हो गए। प्रजापति दक्ष को भला बुरा कहना शुरू किए। उधर से राजा दक्ष के पुरोहित भृगु ऋषि भी शंकर जी के गणों को श्राप देने लगे। दोनों तरफ से खूब एक दूसरे को सुनाया गया। जिसके बाद शंकर जी उस सभा से वापस लौट कर आ गए।

वापस आने के बाद शंकर जी इस बात को अपनी पत्नी सती जी को भी नहीं बताए। इधर प्रजापति दक्ष शंकर जी को अपमानित करने के लिए बड़े यज्ञ का आयोजन शुरू कर दिए। इस यज्ञ का आयोजन उत्तराखंड के हरिद्वार से ऊपर देवभूमि में आयोजित किया जा रहा था। जिस जगह का नाम कनखल है। वहां पर यज्ञ के आयोजन में बड़े-बड़े ऋषि, महर्षि, तपस्वी सभी लोग आ रहे थे, जा रहे थे। आकाश मार्ग से कई विमान आ रहे थे। कई विवान जा रहे थे।

जहां निमंंत्रण न हो वहां नहीं जाना चाहिए 

इस घटना को देखकर के सती जी मन में सोच रही थी कि इतने विमान कहां जा रहे हैं। तब तक आसपास में रहने वाली महिलाएं सती जी से कहती हैं, कि आपके पिताजी बड़े यज्ञ का आयोजन कर रहे हैं। आपको जानकारी नहीं है। सती जी कहती हैं, नहीं मुझे जानकारी नहीं है। शिवजी से आकर के सती जी पूछती हैं कि महाराज मेरे पिताजी क्या यज्ञ कर रहे हैं। आपको निमंत्रण मिला है। शंकर जी ने कहा नहीं देवी जी मुझे निमंत्रण नहीं मिला है। 

सती जी कहती है नहीं नहीं आपको निमंत्रण जरूर मिला होगा। हो सकता है निमंत्रण कहीं खो गया हो, आपको प्राप्त नहीं हो पाया हो, मेरे पिता यज्ञ कर रहे हैं और आपको निमंत्रण नहीं मिलेगा। ऐसा नहीं हो सकता है। देखिए बताया गया है कि ससुर और दामाद के बीच में आज से नहीं बल्कि पहले से ही कुछ न कुछ खटपट रहता है। आपस में बनता नहीं है। अब सती जी को विश्वास नहीं हो रहा था। शंकर जी उनको कई प्रकार से समझा रहे थे।

पत्नी को पति की बातों का अवहेलना नहीं करना चाहिए

सती ने कहा हम लोगों को पिताजी के यहां चलना चाहिए। शंकर जी ने कहा नहीं देवी हम नहीं जा सकते हैं और आपको भी हम जाने की आज्ञा नहीं देंगे। सती जी ने कहा क्या बात है, क्या आप मेरे पिता से कुछ विवाद किए हैं। शंकर जी ने कहा हां आपके पिता के साथ मेरा विवाद चल रहा है। वही शंकर जी पूरे घटनाक्रम की जानकारी सती को बताते हैं। फिर भी सती अपने पिता के यज्ञ में जाने के लिए तैयार हो जाती हैं। सती कहती है कि पिता है थोड़ा बहुत नाराज हो जाते हैं। चलिए हम लोग चलेंगे तो वह मान जाएंगे। मैं अपने पिता को मना लूंगी। बार-बार शंकर जी समझा रहे थे लेकिन सती नहीं मान रही थी।

सती जी कहती हैं कुछ ऐसे स्थान होते हैं, जहां पर बिना बुलाए भी जाया जा सकता है। जैसे पिता के घर, भाई के घर, गुरु के यहां, पुरोहित के यहां, राजा के यहां, डॉक्टर, वैद्य, सामाजिक कार्यक्रम में बिना निमंत्रण के भी जाया जा सकता है। शंकर जी ने कहा देवी आप ठीक कह रही हैं। लेकिन कभी-कभी पिता के यहां, भाई के यहां जाने से काम और बिगड़ सकता है। इसीलिए कभी-कभी मर्यादा का भी पालन करना चाहिए।

कुछ रहस्य को किसी के साथ भी नहीं बताना चाहिए

शंकर जी कहते हैं सती आपके पिता के द्वारा मुझे अपमानित किया गया हैं। लेकिन उस अपमान की जानकारी मैं किसी को नहीं बताया हूं। शास्त्रों में बताया गया है कि कुछ रहस्य को किसी के साथ भी नहीं बताना चाहिए। जैसे उम्र, संपत्ति, अपना दुख, वैवाहिक मर्यादा, अपने घर के अंदर की बातों की जानकारी इत्यादि किसी को नहीं बताना चाहिए।

इसीलिए अपमानित होने के बाद भी हमने उसकी जानकारी आपको नहीं दिया। फिर भी सती अपने पिता के यज्ञ में जाने को लेकर अपनी प्रतिज्ञा दोहरा रही है। सती जी कुछ दूर आगे बढ़ती हैं। फिर वापस शंकर जी के पास आती हैं। शंकर जी अपने नेत्रों को बंद कर लेते हैं। पूछती है कि महाराज आज्ञा दीजिए। शंकर जी मौन हो जा रहे हैं। इस प्रकार से तीन बार सती शंकर जी से आज्ञा लेने के लिए गई और वापस आकर के पूछती हैं। 

भगवान श्रीमन नारायण का लिखा कोई नहीं मिटा सकता है

अंत में सती गुस्से में होकर के अपने बालों को लहराते हुए आगे बढ़ जाती हैं। उनके आंख लाल हो चुके थे। भहैं तने हुए हैं। मुख पर गुस्से दिखाई पड़ रहे हैं और सती पति की बातों का अवहेलना करके आगे बढ़ रही है। शंकर जी मन ही मन कह रहे हैं मेरे रोकने से बड़े-बड़े संकट रुक जाते हैं। लेकिन आज सती नहीं रूक रही है। जरूर कुछ बड़ा संकट आने वाला है। कहा गया है कि ब्रह्मा शंकर के द्वारा लिखा हुआ मिट सकता है। लेकिन जब भगवान श्रीमन नारायण जो लिख देते हैं, उसको कोई नहीं मिटा सकता है। 

शंकर जी मन ही मन कह रहे हैं आज अंतिम बार सती मेरे पास से जा रही है। अब वापस लौट कर नहीं आएगी। वहीं अपने गणों से शंकर जी कहते हैं कि सती के सारे सामान को पीछे-पीछे आप लोग लेकर के चले जाओ। वहीं सती जी अपने पिता के यज्ञ की ओर आगे बढ़ रही थी। पीछे-पीछे शंकर जी के दूत चल रहे थे। आगे सती राजा दक्ष के यज्ञ में किस प्रकार से शामिल होती है। आगे क्या घटना होती है उसकी जानकारी आगे श्रवण करेंगे।

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