भक्ति और भक्त चार प्रकार के होते हैं : श्री जीयर स्वामी जी महाराज

भक्ति और भक्त चार प्रकार के होते हैं : श्री जीयर स्वामी जी महाराज-परमानपुर चातुर्मास्य व्रत स्थल पर भारत के महान मनीषी संत श्री लक्ष्मी प्रपन्‍न जीयर स्वामी जी महाराज ने कहा कि भक्त चार प्रकार के होते हैं। जिनका भक्ति भी भिन्‍न प्रकार का होता है। पहले भक्त वैसे होते हैं जिनको दुनिया के किसी भी वस्तु से कोई मतलब नहीं होता है। कहां क्या हो रहा है, उससे उनको कोई लेना-देना नहीं होता है।उदाहरण के लिए पूरे दुनिया के जितने भी मानव है, जीव है, उनमें भगवान की सत्ता को देखते हैं। हर जीव में वहीं भगवान श्रीमन नारायण वास करते हैं। इसीलिए वह भक्त किसी का विरोध नहीं करते हैं। चाहे वह कुछ भी करते हो।

भक्ति और भक्त चार प्रकार के होते हैं

जैसे अगर कोई व्यक्ति गलत काम भी कर रहा है, चोरी भी कर रहा है, किसी को मार भी रहा है, तब भी पहले श्रेणी के भक्त चुपचाप देखते रहते हैं। क्योंकि वह मानते हैं कि सब जीव में भगवान वास करते हैं तो जो भी हो रहा है, वह भगवान की कृपा से हो रहा है। लेकिन इस प्रकार के भक्त पूरी दुनिया में कहीं-कहीं देखा जा सकता है। क्योंकि समान्य तौर पर इनकी संख्या बहुत कम है।

bhakti aur bhakt char prakar ke hote hai

दूसरे प्रकार के भक्त

दूसरे प्रकार के भक्त वैसे होते हैं, जो भगवान की भक्ति भी करते हैं। भगवान की आराधना, पूजा, पाठ, सब कुछ करते हैं, लेकिन जहां भी समाज में कुछ गलत हो रहा हो, वहां पर वह उसका विरोध भी करते हैं। जैसे संत, महात्मा, ज्ञानी, पुरुष समय-समय से समाज में हो रहे गलत आचरण, व्यवहार, रहन-सहन, खान पान के खिलाफ समाज को उचित मार्गदर्शन भी देते हैं। जिससे समाज में सामान्य सामंजस्य, शांति, मर्यादा बनी रहे।

दूसर श्रेणी के जो भक्त होते हैं, वह भगवान की भक्ति भी करते हैं तथा कहीं पर भी व्यभिचार होता है, तो उसके खिलाफ मार्गदर्शन देकर समाज को सुधारने का प्रयास करते हैं। दूसरे प्रकार के भक्त भी श्रेष्ठ बताए गए हैं।

दूसरे प्रकार के जो भक्त होते हैं, उनका जीवन भी सात्विक होता है। आहार, व्यवहार, रहन-सहन, आचरण में एकरूपता होती है। वह समय-समय से अपने विचार, व्यवहार, आचरण, रहन-सहन बदलते नहीं है। बल्कि उनका जीवन शैली एक ही प्रकार की होती है। वह हर समय भगवान की सत्ता मानते हैं तथा वैदिक परंपरा के अनुसार अपने जीवन को व्यतीत करते हैं।

तीसरे श्रेणी के भक्त

तीसरे श्रेणी के वैसे भक्त होते हैं, जो समय-समय से अपना व्यवहार, आचरण, पूजा पाठ, रहन, सहन, खान, पान बदलते रहते हैं। जैसे अभी सावन का महीना था, सभी लोग शिव जी की पूजा, आराधना, जल अर्पण कर रहे थे। लेकिन सावन खत्म होने के बाद उनमें से अधिकतर लोगों का रहन-सहन, खान, पान, आहार, व्यवहार बदल जाया करता है। सावन में लोगों का खानपान सात्विक रहता है।

लेकिन जैसे ही सावन खत्म होता है, उसके बाद फिर से वहीं उनका आहार हो जाता है। जैसे सावन के पहले करते थे। लेकिन ऐसे भक्त अच्छे नहीं माने जाते हैं। जो समय-समय से अपना विचार, रहन-सहन, पूजा, पद्धति को बदल देते हैं। वह अच्छे भक्त नहीं है। एक बार जीवन में जब अच्छे विचार, आचरण, भोजन, रहन, सहन आ जाए, उसको कभी त्याग नहीं करना चाहिए।

क्योंकि जब हम कुछ दिनों के लिए ही अच्छे कर्म करते हैं और बाकी समय हमारा काम का श्रेणी बदल जाता है, तब ऐसी स्थिति में हमारे उन अच्छे कर्मों का भी बहुत ज्यादा प्रभाव नहीं होता है। इसीलिए ऐसे भक्तों को थर्ड क्लास का भक्त कहा गया है।

चौथे नंबर के भक्त

चौथे नंबर के भक्त ऐसे होते हैं, जिनको पूजा पाठ भक्ति से कोई मतलब नहीं होता है, न वह भगवान को मानते हैं, न वह पूजा पाठ को मानते हैं, न उनका कोई भगवान के प्रति श्रद्धा होता है। मतलब उनका भक्ति से कोई लेना देना नहीं है। वैसे भक्त फोर्थ क्लास के भक्त बताए गए हैं। इनका कैटेगरी सबसे निम्न स्तर का होता है।

क्योंकि रावण गलत काम करता था। फिर भी कम से कम भगवान के खिलाफ लड़ाई भी करता था, तब भी भगवान का नाम लगभग हर दिन में 10 बार ले लेता होगा। लेकिन चौथे श्रेणी के भक्त जिनका भगवान के भक्ति, पूजा पाठ से कोई मतलब ही नहीं है, न कभी वह गलती से भगवान का स्मरण ही करते हैं। वैसे भक्त सबसे निम्न स्तर के बताए गए हैं।

चार प्रकार के भक्तों में सबसे श्रेष्ठ भक्त

इन चार प्रकार के भक्तों में सबसे श्रेष्ठ भक्त दूसरे नंबर के बताए गए हैं। क्योंकि वह पूरा जीवन भगवान की आराधना में अपना जीवन व्यतीत करते हैं। समाज को सही मार्गदर्शन देने का काम करते हैं। इसीलिए दूसरे प्रकार की भक्ति करना चाहिए। यह भक्त सबसे श्रेष्ठ बताए गया है।

गंगा के पावन तट पर राजा परीक्षित शुकदेव जी से पूछ रहे हैं कि जिनका मरना निश्चित हो गया है, उन्हें क्या करना चाहिए। वही शुकदेव जी राजा परीक्षित को भक्त और भक्ति का मार्गदर्शन दे रहे हैं। भक्त कितने प्रकार के होते हैं। भक्ति कैसे करना चाहिए। वही शुकदेव जी भक्ति के चार प्रकार राजा परीक्षित को बताए हैं। जिसकी व्याख्या स्वामी जी ने विस्तार से लोगों को समझाया।

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