ध्रुव जी 5 वर्ष के उम्र ही बड़े साधक बन गए : श्री जीयर स्वामी जी महाराज – परमानपुर चातुर्मास्य व्रत स्थल पर भारत के महान मनीषी संत श्री लक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी जी महाराज ने ध्रुव जी के साधना पर प्रकाश डाले। ध्रुव जी जन्म के बाद तीन वर्ष की उम्र में ही बड़े ओजस्वी हुए। ध्रुव जी के पिता का नाम उत्तानपाद था। उत्तानपाद जिनके पिता का नाम मनु जी था। ब्रह्मा जी ने अपने शरीर को दो भागों में विभक्त किए थे। जिनके शरीर से मनु और शतरूपा हुए थे। वही मनु और शतरूपा के दो पुत्र और तीन पुत्री हुए।
मनु महाराज के दो पुत्रों में सबसे छोटे पुत्र का नाम उत्तानपाद था। मनु महाराज के बड़े पुत्र तपस्या साधना करने के लिए घर छोड़कर निकल गए थे। जिसके बाद मनु महाराज ने उत्तानपाद को राजगद्दी सौंप दिया। उत्तानपाद राजा बनने के बाद वैवाहिक बंधन में बंध गए। उत्तानपाद का पहला विवाह सुनीति के साथ हुआ। सुनीति का मतलब जो सुंदर नीति पर चलने वाली हो, वही सुनीति कहलाती है। सुनीति को बहुत दिनों तक पुत्र प्राप्त नहीं हो पाया था।
ध्रुव जी 5 वर्ष के उम्र ही बड़े साधक बन गए
एक दिन उत्तानपाद अपने राज्य से बाहर दूसरे राज्य में चले गए। वहां जाने के बाद उस राज्य के राजा की पुत्री के रूप को देखकर के आकर्षित हो गए। उत्तानपाद ने उस राज्य के राजा से कहा कि हम आपकी पुत्री के साथ विवाह करना चाहते हैं। वही उत्तानपाद दूसरी शादी किए। जिनके दूसरी पत्नी का नाम सुरुचि था। सुरुचि का मतलब जो स्वयं की रुचि के अनुसार काम करती हो, वहीं सुरुचि है। उत्तानपाद सुरुचि के साथ विवाह करके वापस अपने राज्य में लौट रहे थे। इधर उनकी पहली पत्नी सुनीति बच्चे को जन्म देने वाली थी। इस बात की जानकारी उत्तानपाद को अभी तक नहीं हुआ था।
उत्तानपाद का स्वागत
उत्तानपाद के स्वागत में राज्य के सभी लोग बड़े ही उत्सुकता के साथ लाइन में खड़े थे। सभी लोग उत्तानपाद का धूमधाम से स्वागत कर रहे हैं। उत्तानपाद ने पूछा आप लोग मेरा स्वागत इस प्रकार से क्यों कर रहे हैं। वहीं उनके राज्य के लोग उनसे कहते हैं कि आप पिता बनने वाले हैं। इस बात को सुनकर उत्तानपाद मन ही मन दुखी भी होते हैं। क्योंकि वह दूसरा विवाह करके दूसरी पत्नी को भी लेकर के आ रहे थे। दूसरी पत्नी जैसे ही घर में आती है, वह उत्तानपाद से पूछती है कि महाराज यह रानी कौन है। उत्तानपाद कहते हैं कि यह मेरी पहली धर्मपत्नी है सुनीति। वहीं उत्तानपाद की दूसरी पत्नी सुरुचि कहती है कि या तो यह घर में रहेगी या हम रहेंगे। आपको निर्णय करना होगा।

वहीं उत्तानपाद अपनी पहली पत्नी सुनीति को घर से निकाल देते हैं। जहां पर दास दासियां रहती है, वहां पर सुनीति को उत्तानपाद रख देते हैं। कुछ दिनों के बाद सुनीति एक बच्चे को जन्म देती है। जिनका नाम ध्रुव जी हुआ। वहीं इधर दूसरी पत्नी सुरुचि भी एक बच्चे को जन्म देती है। जिनका नाम उत्तम रखा गया। ध्रुव जी बचपन में अपने माता के साथ रहते हैं। एक दिन ध्रुव जी अपने माता से पूछते हैं कि माता मेरे पिता का नाम क्या है। माता सुनीति ध्रुव जी के बातों को टाल देती हैं।
ध्रुव जी 5 वर्ष के उम्र में साधना का शुरूआत
एक दिन अचानक ध्रुव जी महल में जाते हैं, वहां जाने के बाद उत्तानपाद जो उस राज्य के राजा हैं, राजगद्दी पर बैठे हुए हैं। उनके बगल में उनकी दूसरी पत्नी सुरुचि बैठी हुई है। ध्रुव जी को ऐसा महसूस होता है कि यही मेरे पिता हैं। अचानक में अपने पिता के गोद में जाकर बैठ जाते हैं। दूसरी पत्नी सुरुचि ध्रुव जी को डांटने लगती है। कहती है कि आपको यदि पिता के गोद में बैठना है तो उसके लिए आपको मेरा पुत्र बनना पड़ेगा। जाओ पहले तपस्या साधना करो। भगवान को प्राप्त करो। उसके बाद दूसरे जन्म में जब तुम मेरे गर्भ में पुत्र के रूप में आओगे, तब तुम अपने पिता के गोद में बैठने का अधिकारी होओगे।
इस बात को सुनकर ध्रुव जी काफी क्रोधित भी होते हैं। क्रोध में रोते हुए अपने माता के पास आ जाते हैं। माता सुनीति से कहते हैं, मां हम अपने पिता के गोद में जाकर के बैठ गए। जिसके बाद दूसरी माता ने मुझे इस प्रकार से डांट फटकार लगाई है। वह अपने आप को भगवान से भी ज्यादा बड़ी समझती हैं। वहीं ध्रुव जी लगभग उनका उम्र 4 वर्ष का होगा, वन में चले जाते हैं। वृंदावन और प्रयागराज के बीच सुंदरबन में ध्रुव जी आगे बढ़ रहे हैं। वहीं नारद जी की ध्रुव जी से भेंट होती है। नारद जी कहते हैं पुत्र तुम छोटे हो इस अवस्था में तुम कहां जा रहे हो। जंगल में तुम्हें शेर, बाघ इत्यादि मार डालेंगे। घर को लौट जाओ। ध्रुव जी कहते हैं कि नहीं नहीं मुझे घर नहीं लौटना है। हम भगवान श्रीमन नारायण की आराधना करेंगे।
ध्रुव जी निकल गए भगवान की साधना तपस्या में
चाहे कुछ भी हो हम भगवान की साधना तपस्या करेंगे। जो भी होगा हमें स्वीकार होगा। नारद जी मन में विचार किए कि यह बालक बहुत ही दृढ़ निश्चय वाला है। वहीं नारद जी ध्रुव जी को एक मंत्र देते हैं, ओम नमो भगवते वासुदेवाय। कहते हैं इसी मंत्र का जाप करना। तुम एक दिन भगवान को जरूर प्राप्त करोगे। वहीं ध्रुव जी शुरुआत के 3 महीने 3 दिन पर एक दिन कुछ खाते हैं और भगवान का ध्यान करते रहते हैं। 3 महीने के बाद ध्रुव जी 6 दिन तक उपवास रहते हैं, उसके बाद एक दिन कुछ थोड़ा बहुत जलपान करते हैं। भगवान श्रीमन नारायण के मंत्रों का जाप करते रहते हैं। 6 महीने के बाद ध्रुव जी 9 दिन तक उपवास रहते हैं। एक दिन कुछ जलपान करते हैं। फिर भगवान का स्मरण करते रहते हैं।
इस प्रकार से 12 महीने के बाद ध्रुव जी बिना कुछ खाए पिए लगातार प्राण वायु प्राणायाम करना शुरू करते हैं। जिसमें सिद्ध पुरुष प्राण को रोक करके साधना करते हैं। जैसे ही ध्रुव जी प्राण वायु प्रणायाम करना शुरू करते हैं, संसार में उथल-पुथल मच जाता है। जीव, देवता, ब्रह्मा, शंकर जी भी सांस लेने में कठिनाई महसूस करने लगते हैं। ऐसा लगता है मानो संसार में सांस लेना मुश्किल हो गया है। सभी लोग ब्रह्मा जी के पास जाते हैं। देवता लोग कहते हैं, हम लोग सांस नहीं ले पा रहे हैं। ब्रह्मा जी कहते हैं मेरा भी यही हाल है।
6 महीना किए तपस्या
फिर सभी लोग भगवान विष्णु के पास जाते हैं। वहीं विष्णु जी कहते हैं, मेरा एक भक्त ध्रुव है, जो प्राण वायु को रोक कर रखा है। जिसके कारण आप लोग सांस नहीं ले पा रहे हैं। जब तक वह प्राण वायु को रोक करके प्रणायाम करता रहेगा, तब तक आप लोगों को ऐसे ही रहना पड़ेगा। वहीं सब लोग भगवान विष्णु से निवेदन करते हैं। जिसके बाद विष्णु भगवान ध्रुव जी के पास जाते हैं। ध्रुव जी का ध्यान अपने तरफ से हटा लेते हैं। वहीं ध्रुव जी प्राणवायु को रोक कर ध्यान से बाहर आते हैं।
ध्रुव जी देखते हैं कि यहां पर साक्षात भगवान श्रीमन नारायण दिखाई पड़ रहे हैं। वहीं भगवान कहते हैं कि ध्रुव जी वरदान मांगो। ध्रुव जी कहते हैं कि हम आपके धाम को जाना चाहते हैं। वहीं भगवान श्रीमन नारायण ध्रुव जी को कहते हैं कि तुम पहले घर जाओ। वहां पर राजकाज की व्यवस्था अच्छे से संभालो। जिसके बाद तुम मेरे धाम आना। वाहीं ध्रुव जी भगवान की बातों को मान करके वापस अपने राज्य में लौट जाते हैं। जिसके बाद उत्तानपाद के द्वारा ध्रुव जी का बहुत ही हर्षो उल्लास के साथ स्वागत किया जाता है। उत्तानपाद अपने पुत्र ध्रुव को राजगद्दी पर बैठा देते हैं। ध्रुव जी राजकाज की व्यवस्था करने लगते हैं।
ध्रुव राजा बने
अचानक एक दिन उत्तानपाद के दूसरे पत्नी के दूसरे पुत्र उत्तम यक्ष लोगों के साथ युद्ध करने के लिए जाते हैं। वही यक्ष लोगों के द्वारा उत्तम को मार दिया जाता है। जिसके प्रतिशोध में ध्रुव जी यक्ष लागों को बहुत नुकसान पहुंचाते हैं। बाद में ध्रुव जी अपने राजकाज की व्यवस्था करते हैं। ध्रुव जी का विवाह भी होता है जिससे पुत्र की प्राप्ति होती हैं। आगे ध्रुव जी किस प्रकार से राजकाज की व्यवस्था करते हैं, शेष चर्चा अगले दिन जय श्रीमन नारायण।
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रवि शंकर तिवारी एक आईटी प्रोफेशनल हैं। जिन्होंने अपनी शिक्षा इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी स्ट्रीम से प्राप्त किए हैं। रवि शंकर तिवारी ने डॉ एपीजे अब्दुल कलाम टेक्निकल यूनिवर्सिटी लखनऊ से एमबीए की डिग्री प्राप्त किया हैं।