गृहस्थ आश्रम में पुत्र होना चाहिए : श्री जीयर स्वामी जी महाराज 

गृहस्थ आश्रम में पुत्र होना चाहिए : श्री जीयर स्वामी जी महाराज – परमानपुर चातुर्मास व्रत स्थल पर भारत के महान मनीषी संत श्री लक्ष्मी प्रपन्‍न जीयर स्वामी जी महाराज ने कहा कि गृहस्थ आश्रम में एक पुत्र जरूर होना चाहिए। मातृ, पितृ ऋण से मुक्त होने के लिए पुत्र होना चाहिए। शास्त्रों में बताया गया है कि जिस व्यक्ति के घर में यदि दो भाई या चार भाई हो और एक भाई को भी पुत्र है तो भी दूसरे भाई को पुत्र वाला ही माना जाता है। वैसे जिनको पुत्र नहीं है, उनको भी यदि लड़की, पुत्री भी हुई है, तब भी उन्हें पुत्र वाला माना जाता है। क्योंकि पुत्र और पुत्री में कोई अंतर नहीं है। शास्त्रों में यह भी बताया गया है कि यदि लड़की को भी लड़का हो जाता है, तब भी उसके नाना नानी पुत्र वाले माने जाते हैं। इस प्रकार से मातृ, पितृ ऋण से उऋण होने के लिए पुत्र का जन्म देना चाहिए।

गृहस्थ आश्रम में पुत्र होना चाहिए

पांच सुख गृहस्थ आश्रम में बताया गया है। उनमें एक सुख पुत्र का भी बताया गया है। पुत्र ऐसा होना चाहिए जो माता-पिता की आज्ञा को मानता हो। माता-पिता की सेवा करता हो। माता-पिता की मृत्यु के बाद श्राद्ध तर्पण भंडारा इत्यादि विधि विधान से करता हो। वैसे पुत्र को बताया गया है पुत्र कुपुत्र नहीं होना चाहिए। जैसे आज समाज में माता-पिता अपने बच्चे बच्चियों की शादी कर देते हैं। उसके बाद पत्नी जी आज्ञा देने लगती है।

वही पुत्र जिनको माता-पिता पढ़ा लिखा करके आगे बढ़ाएं हैं, वह पुत्र अपने माता-पिता की बातों का अवहेलना करता है। अपने पत्नी के बातों का पालन करता है। पत्नी को बताया गया है कि पत्नी ऐसी होनी चाहिए, जो समाज, संस्कृति, सभ्यता, मर्यादा का पालन करती हो।

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अर्धांगिनी का मतलब

लेकिन आजकल जिस प्रकार से शादी के बाद पुत्र पत्नी के बातों का पालन करते हैं। जैसे पति नहीं बल्कि उनका आचरण एक तुच्छ प्राणी के समान हो जाता है। जो पत्नी कहती है उतना ही सुनते हैं। उतना ही काम करते हैं। समाज संस्कृति माता-पिता से उनका कोई मतलब नहीं होता है। इसीलिए पत्नी ऐसी होनी चाहिए जो पति का आदर, सम्मान, आज्ञा का पालन करती हो। पत्नी को अर्धांगिनी भी कहा जाता है। अर्धांगिनी का मतलब पति के अच्छे विचार गुण में जो आधा बिना कुछ किए प्राप्त कर लेती है, उसे अर्धांगिनी कहा जाता है। लेकिन अर्धांगिनी भी ऐसी होनी चाहिए जो पति को अच्छे मार्गों पर चलने की प्रेरणा देती हो। 

माता-पिता समाज संस्कृति परिवार में सामंजस्य रखते हुए मर्यादा को स्थापित करती हो। इसीलिए शास्त्रों में बताया गया है कि नारी चाहे तो समाज को सुधार सकती है। लेकिन वही नारी जब अपने अच्छे विचार, मर्यादा, संस्कार, संस्कृति को त्याग करती है। तब समाज संस्कृति पर उसका गलत प्रभाव दिखाई पड़ने लगता है।

विवाह शादी को केवल एक इंजॉय का माध्यम नहीं

एक बार एक महात्मा जी घर छोड़कर के बिना शादी विवाह किए त्याग तपस्या कर रहे थे। अचानक एक दिन किसी इतिहास, पुराण, ग्रंथ श्रवण करते हुए पढ़ लिए कि पुत्र के बिना व्यक्ति का तरण नहीं होता है। अब वह महात्मा जी पूजा पाठ इत्यादि को त्याग करके विवाह करने के लिए प्रयास करने लगे। वही भगवान श्रीमन नारायण मन ही मन सोच रहे थे कि यह हमारा भक्त जो सही मार्ग पर चल रहा था, वह अधूरी जानकारी के कारण गलत मार्गों पर चलने के लिए आगे बढ़ रहा है। 

महात्मा जी रास्ते में जा रहे थे चलते-चलते एक कुआं के पास पहुंचे, उस समय रात्रि का समय हो गया था, सोचे कि यही पर विश्राम कर लेते हैं। वहीं पर कुआं के पास में सो गए। भगवान श्रीमन नारायण ने कहा कि आज महात्मा जी को यहीं पर हम ज्ञान देते हैं। वही महात्मा जी सोए हुए थे। स्वप्न में देख रहे हैं मेरा विवाह हो गया है। मुझे एक पुत्र भी हो गया है। पत्नी कह रही है कि पुत्र हो गया है, सुलाने के लिए एक सोने का पालना खरीद कर लाइए। वही महात्मा जी कह रहे हैं कि हम लोग थोड़ा सा आगे पीछे हो जाते हैं। पुत्र बीच में सो जाएगा। वही स्वप्न में देखते हैं कि दूसरा पुत्र भी हो गया है। अब पत्नी का रही है कि दो पुत्र हो गए हैं। सोने के लिए जगह की कमी है, इसीलिए व्यवस्था किया जाए। 

शादी एंजॉय नहीं

महात्मा जी कह रहे हैं हम लोग आपस में थोड़ा आगे पीछे होकर के यहीं पर व्यवस्था कर लें। दूसरे पुत्र को भी बीच में सुला दिया जाए। वहीं पर महात्मा जी स्वप्न में थोड़ा सा पीछे की तरफ हटे तब तक कुएं में जाकर गिर पड़े। अब जब कुएं में गिरे तब तक उनका नींद भी खत्म हो गया। महात्मा जी कहने लगे स्वप्न में शादी करके कुआं में गिर गया। यदि सचमुच शादी करता तो पता नहीं कहां गिरना पड़ता। इसीलिए शादी एंजॉय नहीं है। शादी करना एक वैदिक परंपरा है एक मर्यादा है।

विवाह शादी को केवल एक इंजॉय का माध्यम नहीं मानना चाहिए। बल्कि वैदिक परंपरा के अनुसार कुल गोत्र मर्यादा के अनुसार अच्छे घर में शादी करना चाहिए। उसके बाद गृहस्थ आश्रम में रहते हुए अच्छे पुत्र को जन्म देना चाहिए। शादी विवाह गृहस्त परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए एक माध्यम है। जिससे अच्छे बालक बालिकाओं का जन्म देकर शिक्षा, संस्कार, संस्कृति, ज्ञान देकर अपने मातृ पितृ ऋण से मुक्त होना चाहिए।

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