हर माता-पिता को अपने बच्चों को अनुशासन, शिक्षा और संस्कार देना चाहिए : श्री जीयर स्वामी जी महाराज – परमानपुर चातुर्मास्य व्रत स्थल पर भारत के महान मनीषी संत श्री लक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी जी महाराज ने कहा कि माता-पिता को अपने बच्चों को 5 वर्ष तक अनुशासन की शिक्षा देना चाहिए। 5 से 10 वर्ष के बीच संस्कार की शिक्षा देना चाहिए। 10 वर्ष से 20 वर्ष के बीच शिक्षोपार्जन की शिक्षा देना चाहिए तथा शास्त्र के अनुसार 25 वर्षों के बाद अपने पुत्र के साथ मित्र के जैसा व्यवहार करना चाहिए।
वैसे सामान्य सामाजिक स्थिति को देखते हुए, जिनके पुत्र का आयु 30 वर्ष या 35 वर्ष हो जाए, उसके साथ माता-पिता को मित्र सहयोगिजन एवं अपने समकक्ष के जैसा ही व्यवहार करना चाहिए। यदि आप ऐसा नहीं करते हैं तो आपके पुत्र आपको उचित सम्मान नहीं करेंगे।
हर माता-पिता को अपने बच्चों को अनुशासन, शिक्षा और संस्कार देना चाहिए
कुछ माता-पिता बच्चों के प्यार में इतने ज्यादा भावुक हो जाते हैं, जिसके कारण वह अपने बच्चे बच्चियों को सही शिक्षा नहीं दे पाते हैं। बच्चों को शिक्षा देने के लिए कहीं घर से बाहर जाना होता है, वह बाहर नहीं जाने देते हैं। मेरा लड़का बाहर कैसे रहेगा, कैसे खाना बनाएगा। इस प्रकार से जो अभिभावक अपने बच्चों को घर के माया जाल में लगाकर रखते हैं, वह अपने बच्चों के पैर पर कुल्हाड़ी मारने का ही काम करते हैं।
क्योंकि जिस बच्चे का उम्र 12 वर्ष, 15 वर्ष के आसपास हो गया है, उस बच्चों को पढ़ने के लिए जहां पर भी जाने की जरूरत हो, वहां पर भेजना चाहिए। वही 18 वर्षों के बाद बच्चे को स्वतंत्र रूप से शिक्षा ग्रहण करने के लिए माता-पिता को छोड़ना चाहिए। जिससे वह बच्चा समाज की कठिनाइयों को समझे। जिससे उसका आत्मविश्वास मनोबल बढ़ाया जा सके।

क्योंकि जब तक माता-पिता अपने बच्चों को जिम्मेदारियों का एहसास नहीं कराएंगे तब तक बच्चा अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पाएगा। इसीलिए अपने बच्चों को प्यार के बंधन में बांधकर नहीं रखना चाहिए। बल्कि उसे अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए उत्साहित करना चाहिए। जिससे वह सही शिक्षा, संस्कार को प्राप्त करके अपने जीवन में नई ऊंचाइयों को प्राप्त कर सके।
चार क्षेत्र बैकुंठ के समान बताया गया है
श्रीमद् भागवत प्रसंग अंतर्गत कल की कथा को आगे बढ़ाते हुए स्वामी जी ने भगवान विष्णु के अंशाअवतार ऋषभदेव के 100 पुत्रों में सबसे श्रेष्ठ भरत जी के कथाओं पर प्रकाश डाले। ऋषभदेव ने अपने सबसे लाडले पुत्र भरत को राजगद्दी पर बैठा दिया। जिसके बाद भरत जी विश्व रूप प्रजापति की पुत्री पांचजनी से विवाह किए। विवाह के बाद राज ऋषि भरत को पांच पुत्र हुए। जिनमें जेष्ट पुत्र धूम्रकेतु हुए। राज ऋषि भरत ने बड़े पुत्र धूम्रकेतु को अपने राज्य का राजा बना दिए। वहीं अन्य चार पुत्रों को भी अलग-अलग राज्यों का राज्य देकर भरत जी आश्रम की ओर निकल पड़े।
राज ऋषि भरत जी का जीवन चरित्र बहुत ही भक्तिमय था। भरत जी पुलह आश्रम आ गए जिसे सोनपुर के नाम से जाना जाता है। सोनपुर एक ऐसा क्षेत्र है जो बैकुंठ के समान बताया गया है। चार ऐसे क्षेत्र हैं, जो बैकुंठ लोक के समान हैं। हरिहर क्षेत्र जिनको सोनपुर के नाम से जाना जाता है। भृगु क्षेत्र जो बलिया के नाम से जाना जाता है। कुरुक्षेत्र जो हरियाणा के गुरुग्राम के नाम से जाना जाता है तथा चौथा वराह क्षेत्र जहां पर भगवान वराह के रूप में प्रकट हुए थे।
भरत जी का तपस्या साधना
भरत जी पुलह आश्रम पर अपना कुटिया बना करके तपस्या साधना करने लगे। एक दिन सिंह ने जोर से दहाड़ लगाया। जिसके कारण एक हिरणी जो गंडगी नदी के किनारे रहती थी, वह सिंह के डर से भागने लगी। वह हरिणी गर्भवती थी। जिसके गर्भ में 9 हिरण पल रहे थे। वहीं गंदगी नदी को पार करके भगाना चाहती थी। भागते-भागते उसके गर्भ के बच्चे भरत जी के आश्रम के आसपास गिर गए। आगे चलकर हिरनी भी अपनी जीवन लीला को समाप्त कर ली। वही राज ऋषि भरत जी को हिरनी के वह नौ बच्चे दिखाई पड़े। जिसके प्रति भरत जी का स्नेह और प्रेम उमड़ पड़ा।
वे हिरनी के बच्चों को अपने आश्रम पर रखने लगे। अपने बच्चों की तरह स्नेह प्यार देने लगे। भरत जी जो तीन बार संध्या पूजा इत्यादि करते थे, वह दो बार करने लगे। धीरे-धीरे उन हिरनी के बच्चों में इतना ज्यादा उनका प्रेम बढ़ गया कि वह अपने पूजा पाठ एक बार करने लगे। भरत जी के मन में कभी-कभी विचार आता कि जब हम नहीं रहेंगे, तब यह सावक कैसे रहेंगे। इनका देखरेख कौन करेगा। वही एक दिन हिरनों का झुंड जा रहा था। उस झुंड में हरनी के बच्चे जाकर के मिल गए तथा उन हिरनों के झुंड में में चले गए। इधर भरत जी इंतजार कर रहे हैं कि सावक मृग लौट कर आएगा। लेकिन बहुत समय बीतने के बाद भी सावक मृग लौटकर नहीं आया।
हर व्यक्ति को अपने इतिहास को जरूर याद रखना चाहिए
वही एक दिन भरत जी अपने शरीर को छोड़कर परलोक सिधार गए। जिसके बाद दूसरे जन्म में भरत जी का जन्म मृग के रूप में हुआ। जहां पर पूरा क्षेत्र में भरत जी साधना कर रहे थे, वहीं पर मृग के रूप में जन्म लिए। दूसरे जन्म में भरत जी को याद था कि हम पहले जन्म में राजा थे। पिछले जन्म के पूरे इतिहास को याद करते रहते थे। शास्त्रों में बताया गया है कि साधारण मानव को भी अपने पीछे की कहानी को जरूर याद रखना चाहिए। चाहे आप कितना भी बड़ा आदमी बन जाइए। लेकिन बड़ा आदमी बनने से पहले आप किस प्रकार से अपने जीवन जीते थे, उसको आपको जरूर याद रखना चाहिए। जिससे आपके अपने स्वरूप को पहचानने में मदद मिलता है।
जो व्यक्ति अपने पिछले इतिहास को याद करता है, उसे कभी भी अपने जीवन में अभिमान नहीं आता है। इसीलिए हर व्यक्ति को अपने इतिहास, अपने पीछे की दुख भरी कहानियों को भी जरूर समय-समय से याद करना चाहिए। वहीं दूसरे जन्म में मृग के रूप में जन्म लिए भरत जी अपने पिछले जन्म की कहानी याद कर रहे हैं। एक दिन मृग के रूप में जन्म लिए भरत जी का शरीर छूट गया। जिसके बाद तीसरे जन्म में भरत जी एक ब्राह्मण अंगीरा कुल में जन्म लिए।
भरत से जड़ भरत कैसे बने
भरत जी के पिताजी तीसरे जन्म में भी उनका नाम भरत शर्मा रख दिए। उनके पिताजी लगातार धर्म ग्रंथ मंत्रों की शिक्षा देते थे। लेकिन भरत जी कुछ नहीं बोलते थे। उनको ऐसा लगता था कि हम यदि मंत्रों को याद कर लेंगे तो मेरे पिताजी पूजा पाठ करने के लिए भेजने लगेंगे। इस प्रकार से जब वह कुछ नहीं बोलते थे, तब एक दिन उनके पिता ने उनका नाम जड़ भरत रख दिया।
कुछ दिनों के बाद जड़ भरत जी के पिताजी चले गए। उनके भाइयों के द्वारा उनको भोजन इत्यादि की व्यवस्था किया जाता था। लेकिन जड़ भरत जी चुपचाप बैठे रहते थे। एक दिन उनके भाइयों ने कहा कि कुछ काम करो, ऐसे बैठने से तुम्हारा भोजन कैसे चलेगा। जड़ भरत जी काम करने के लिए जाते तो काम करते नहीं, बल्कि उसको और भी खराब कर देते थे। एक दिन उनके भाइयों के द्वारा उनको खूब डांटा गया। जिसके बाद घर से उनको निकाल दिया गया।
जड़ भरत जी भटकते हुए जा रहे थे, रास्ते में राजा रहूगढ़ पालकी पर बैठकर जा रहे थे। वहीं अचानक उनके एक कहार का तबीयत खराब हो गया। इसके बाद राजा रघुगढ़ की नजर जड़ भरत जी की तरफ जाती है। वह कहते हैं कि कहार के रूप में उस व्यक्ति को बुला लो। वही जड़ भरत जी कहार के रूप में पालकी को लेकर आगे बढ़ने लगे। जड़ भरत जी के सामने जब भी कोई जीव जंतु आते, वे अचानक अपने पैरों को उठाकर के लंबी चलांग लगाने लगते थे। जिसके कारण पालकी में बैठे राजा रघुगढ़ का सर पालकी में टकराने लगता था।
अपने शरीर पर अभिमान नहीं करना चाहिए
राजा राहूगढ़ अपने कहारों को डांटने लगे। कहारों ने कहा महाराज एक यह जो नया कहार आया है, यही जानबूझकर अपने पैरों को आगे की तरफ तेजी से बढ़ाने लगता है। जिसके कारण पालकी का बैलेंस खराब हो जाता है। वहीं राजा रहूगढ़ जड़ भरत जी को डांटने लगते हैं। जड़ भरत जी के द्वारा यहीं पर राजा रहूगढ़ को पहली बार उपदेश दिया जाता है। जड़ भरत जी कहते हैं, मूर्ख तुम्हें बिल्कुल ज्ञान नहीं है, तुम किसे मारना चाहते हो, यह जो शरीर पांच तत्वों से बना है, इस शरीर में जो भी हैं वहीं चीज मेरे शरीर में भी है। तुमको अपने शरीर पर अभिमान है। जैसे तुम्हारा शरीर बना है, वैसे ही मेरा शरीर बना हुआ है। तुम पालकी में बैठकर उपदेश दे रहो। बहुत प्रकार से जड़ भरत जी ने राजा रहूगढ़ को उपदेश दिया।
इसके बाद राजा रघुगढ़ जो कपिल देव भगवान से शिक्षा प्राप्त करने के लिए जा रहे थे, वहीं से वापस लौट गए। क्योंकि जो उपदेश प्राप्त करने के लिए कपिल देव भगवान के पास जा रहे थे, वहीं उपदेश जड़ भरत जी ने दे दिया। आगे जड़ भरत जी जा रहे थे। वहीं चोरों के सरदार ने एक मंनत किया था, यदि मेरे पुत्र हो जाएंगे तो हम नरबलि देंगे। वहीं उस चोरों के सरदार के घर में एक पुत्र ने जन्म लिया था।
भगवान कभी भी अपने जीव के हत्या से प्रसन्न नहीं होते
वह नरबलि देने के लिए किसी आदमी को खोज रहा था। वही उसको जड़ भरत जी दिखाई पड़ गए। वहीं चोरों के सरदार ने जड़ भरत जी को भद्रकाली के यहां बलि देने के लिए लेकर गया। जहां पर बलि देने से पहले जड़ भरत जी को अच्छे से स्नान कराया गया। सुंदर नए वस्त्र पहनाए गए। अच्छे-अच्छे पकवान खिलाया गया। तिलक लगाया गया। जिसके बाद चोरों के सरदार जैसे ही बलि देने के लिए तलवार उठाकर मारना चाहा, तब तक भद्रकाली प्रकट हो गई।
वहीं भद्रकाली ने चोरों के सरदार का तलवार से सिर काट दिया। जिसके बाद जड़ भरत जी वहां से मुक्त हुए। वहीं जड़ भरत जी वहां से निकल गए। जिसके बाद जड़ भरत जी अपने जीवन को तपस्या साधना में लगाते हुए लय कर दिए। जितने भी प्रकार की बलि दी जाती है। वह बहुत ही गलत है। क्योंकि संसार में जितने भी जीव हैं। वह सभी भगवान श्रीमन नारायण के अंश स्वरूप हैं। भगवान कभी भी अपने जीव के हत्या से प्रसन्न नहीं होते हैं। इसीलिए जिस प्रकार से आज भी समाज में बलि देने की परंपरा है, वह बहुत ही गलत है। इससे कोई भी देवी देवता प्रसन्न नहीं होते हैं। बल्कि इसका दुष्प्रभाव बलि देने वाले के ऊपर पड़ता है। इसीलिए हर व्यक्ति को दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य को समझना चाहिए। इस
दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य को समझना चाहिए
कभी-कभी व्यक्ति जब किसी को मारते हुए देखता है या मरे हुए व्यक्ति को जाते हुए देखता है, उस समय उसे अपने स्वरूप को याद करना चाहिए। क्योंकि दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य यही है कि आप जानते हैं कि आपको भी एक न एक दिन मरना है। लेकिन इस आश्चर्य को आप महसूस नहीं करते हैं। इसीलिए चाहे आप बलि देते हो या हिंसा करते हो, जीव की हत्या करते हो, उस समय आपको अपने स्वरूप को भी समझना चाहिए। आप मृत्यु से डरते हैं, लेकिन दूसरे जीव की हत्या करते हैं। इस पर विचार करने की जरूरत है।
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रवि शंकर तिवारी एक आईटी प्रोफेशनल हैं। जिन्होंने अपनी शिक्षा इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी स्ट्रीम से प्राप्त किए हैं। रवि शंकर तिवारी ने डॉ एपीजे अब्दुल कलाम टेक्निकल यूनिवर्सिटी लखनऊ से एमबीए की डिग्री प्राप्त किया हैं।