इतिहास पुराण संत और संस्कृति का अनादर करने वाले त्‍यागने योग्‍य: जीयर स्‍वामी

भारत के महान मनीषी संत श्री लक्ष्मी प्रपन्‍न जीयर स्वामी जी महाराज ने अगरेड़ गांव में प्रवचन करते हुए कहा कि जो व्यक्ति संस्कृति, संस्कार, संत, इतिहास, पुराण एवं मर्यादा को त्याग देता है, उसे त्याग देना चाहिए। कृष्ण अवतार में भगवान श्री कृष्ण समाज में असत्य पर सत्य के विजय के लिए सत्य के साथ अंत तक खड़े रहे, लेकिन उनके ही परिवार में जब उनके घर के लोग ही समाज, संस्कृति, सभ्यता, ईमानदारी, संत, महात्मा, इतिहास, पुराण का अनादर करने लगे तब भगवान श्री कृष्ण ने अपने लोगों का भी त्याग कर दिया था। 

इससे हम सभी लोगों को भी यह संदेश प्राप्त होता है कि चाहे वह अपने घर का ही कोई व्यक्ति क्यों न हो यदि वह समाज, संस्कृति, संत, महात्मा, धर्म से उदास व्‍यवहार करता है तो उससे हमें अपने आप को जरूर मर्यादित रखना चाहिए। क्योंकि वैसे व्यक्ति समाज हित, राज्यहित, देशहित के लिए हितकारी नहीं है। बल्कि पृथ्वी पर वह एक भार के समान है। पृथ्वी माता पर जनसंख्या चाहे कितना भी बढ़ जाए उससे पृथ्वी माता कभी भी अपने आप को भारी महसूस नहीं करती हैं। लेकिन वही जब पृथ्वी पर वैसे व्यक्ति की संख्या बढ़ जाती है, जो दुराचारी होता है समाज संस्कृति को भ्रष्ट करने वाला होता है लगातार पृथ्वी पर गलत प्रकार के कामों को करता है, वैसे लोगों से ही पृथ्वी माता को भार महसूस होने लगता है।

भगवान श्री कृष्ण का अवतार असत्य पर सत्य को विजय दिलाने के लिए हुआ था। लेकिन जब उनके ही परिवार के लोग संत महात्माओं के साथ गलत व्यवहार करने लगे तब कृष्ण जी ने अपने परिवार के लोगों के व्यवहार को देखकर के बहुत ही दुखी हुए। इसीलिए समस्त प्राणियों को अपना आचरण धर्ममय रखना चाहिए।

रामावतार में एक बार सीता जी ने भी लक्ष्मण जी को अपने मर्यादा को त्यागने पर विवस कर दिया था, जिसका परिणाम बहुत ही गलत हुआ। भगवान श्री राम ने लक्ष्मण जी को सीता जी की निगरानी करने का आदेश देकर के कपटी मृग को पकड़ने के लिए गए थे। लेकिन सीता जी ने कड़े शब्दों का उपयोग करते हुए लक्ष्मण जी को श्री राम के वचनों को तोड़ने के लिए विवस कर दिया था। इसीलिए हम सभी प्राणियों को किसी भी परिस्थिति में अपने धर्म, आचरण, व्यवहार, आहार का सदैव विवेक का उपयोग करते हुए पालन करना चाहिए।

Leave a Comment