मंत्र ही मन को काबू करने का सबसे बड़ा माध्यम : श्री जीयर स्वामी जी महाराज 

मन को काबू करने का सबसे बड़ा माध्यम मंत्र ही हैं- परमानपुर चातुर्मास्य व्रत स्थल पर भारत के महान मनीषी संत श्री लक्ष्मी प्रपन्‍न जीयर स्वामी जी महाराज ने मंत्र के महत्व पर प्रकाश डाला। श्रीमद् भागवत कथा के अंतर्गत गंगा के पावन तट पर राजा परीक्षित के सवालों का जवाब देते हुए शुकदेव जी कहते हैं कि राजा परीक्षित जिस व्यक्ति को मरना निश्चित है उसे योग करना चाहिए। योग चार प्रकार के होते हैं। मंत्र योग, लय योग, हठयोग और राजयोग।

मंत्र किसे कहते हैं

मंत्र शब्द की व्याख्या शास्त्र में विस्तार से की गई। वेद मंत्र, उपनिषद के मंत्र, पुराण के मंत्र, इतिहास के मंत्र इत्यादि की चर्चा की गई है। वेद के मंत्रों का जप उच्चारण करने के लिए कुछ नियम लागू होते हैं। वहीं उपनिषद् के मंत्र को जपने के लिए भी कुछ विधि बताया गया है। लेकिन पुराण, इतिहास के मंत्र को कोई भी व्यक्ति जप सकता है।

वैसे शब्द, वाक्य जिसमें भगवान श्रीमन नारायण के अलग-अलग नाम, लीला, गुण, उपदेश का वर्णन किया गया हो, उसका उच्चारण किया जाता हो वही मंत्र है। जिस शब्द या वाक्य में नमः शब्द जुड़ा हुआ है, उसे भी मंत्र कहा गया है। जैसे नारायण शब्द भी एक मंत्र है। सृष्टि के पहले और सृष्टि के बाद सृष्टि के मध्य में केवल एक मात्र श्रीमन नारायण रहते हैं। 

mantra hi man ko kabu karne ka bada madhyam

श्रीमन नारायण से ही अलग-अलग भगवान के स्वरूपों का अवतार हुआ है। जिनका नाम श्री राम, श्री कृष्ण, नरसिंह, वामन इत्यादि बताया गया हैं। मंत्र जप करने के लिए शास्त्रों में या गुरु के द्वारा अपने शिष्य को मंत्र बताया जाता हैं। लेकिन जिनको अपने गुरु मंत्र की जानकारी नहीं हैं, वे भगवान के नाम का भी जप करते हैं, तब भी उनको उतना ही फल मिलता है। जितना वेद मंत्र इत्यादि को जप करने से होता है।

मंत्र ही मन को काबू करने का सबसे बड़ा माध्यम

नमः शब्द का मतलब क्या होता है। नमः दो शब्दों से बना है। न शब्द से नमस्कार का बोध होता है। म: शब्द से हटाने का बोध होता है। मतलब जिसको नमस्कार करने से, प्रणाम करने से हमारे मन के दुर्भावना, दुर्व्यवहार, गलत आचरण, गलत विचार, गलत व्यवहार, आहार हट जाता हो, वैसे भगवान ईश्वर को मैं नमस्कार प्रणाम करता हूं।

इसीलिए शास्त्रों में बताया गया है कि जिस शब्द या वाक्य में नमः शब्द जुड़ा हुआ हो, उसे मंत्र कहते हैं। लेकिन आज कुछ लोग समाज में नमः शिवाय मंत्रों को प्रचारित कर रहे हैं। नमः शिवाय मंत्र जपने लायक है। लेकिन शिव पुराण के अनुसार भगवान शिव और पार्वती के द्वारा जो संवाद किया गया है। जो उपदेश दिया गया है। उसको भी हमें पढ़ना चाहिए, मनन करना चाहिए, समझना चाहिए। जिसमें भगवान शिव की आराधना करने वाले को बताया गया है। नमः शिवाय तो जपना ठीक है। लेकिन ओम नमः शिवाय का जप करना सबसे उत्तम और श्रेष्ठ है। इसीलिए किसी भी वाक्य और शब्दों को किसी को तोड़ने का अधिकार नहीं है। 

वेद पुराण इतिहास में जो भी पहले लिखा जा चुका है, उसको बदलने का अधिकार किसी भी व्यक्ति को नहीं है। आप विद्वान पुरुष हैं, तो आप अलग से अपना कोई शब्द या कोई वाक्य बना सकते हैं। लेकिन जो पहले से ऋषि, महर्षि, तपस्वी के द्वारा लिखा जा चुका है। उन्होंने जो लिखा है, उसे समय की स्थिति, घटना, विषय के अनुसार लिखा गया है। लेकिन आज कुछ लोग उन घटनाओं को, उन शब्दों को बदलने का प्रयास कर रहे हैं। जो कि बहुत ही गलत है। 

क्योंकि आज जैसा परिस्थिति, घटनाक्रम या स्थित है, उसके अनुसार आप सोच रहे हैं। लेकिन जब वेद, पुराण और इतिहास की रचना की गई थी, उस समय की स्थिति उपदेश को जिन्होंने देखा, महसूस किया उसके अनुसार ही अलग-अलग ग्रंथों का रचना किया गया है। इसीलिए उसमें किसी भी प्रकार के बदलाव और हस्तक्षेप करने की जरूरत नहीं है।

मंत्र का विशेष महत्व

स्वामी जी ने कहा कि मंत्र जितने भी शब्द का हो उतना लाख बार जप करना चाहिए। जितना शब्द का मंत्र है, उतना लाख बार जब आप जप करते हैं, तब एक पुरुष चरण होता है। इस प्रकार से शास्त्रों में गुरु मंत्र या मंत्र को चार पुरुष चरण जप करने को बताया गया हैं। जिससे व्यक्ति के जीवन में अलग-अलग पुरुष चरण करने से अलग-अलग प्रकार की शक्तियां प्राप्त होती है।

एक पुरुष चरण का आप जप करते हैं तो आपके पितर लोग प्रसन्न होते हैं। दूसरे पुरुष चरण का जप करते हैं, तब उस व्यक्ति के जीवन में शांति की प्राप्ति होती है। तीसरे पुरुष चरण के जप करने से मन, विचार, बुद्धि, तपस्‍वी के समान हो जाता है। चौथे पुरुष चरण का जप करने से सिद्धि की प्राप्ति होती है। जिसके बाद उस व्यक्ति के द्वारा भगवान के कृपा से उसके वचनों में शक्ति प्राप्त हो जाती है। इस प्रकार से गुरु मंत्रों का जप करने को बताया गया हैं।

योग चार प्रकार के होते हैं 

मंत्रों का जप करने का भी नियम बताया गया हैं। स्नान करके व्यक्ति को एक आसन पर बैठना चाहिए। अपने शरीर की स्थिति को देखते हुए पृथ्वी पर बैठकर सुखासन या योग के अनुसार और भी कई प्रकार के आसान बताए गए हैं। जिस आसन पर आप सीमित होकर के एक घंटा, दो घंटा बैठ सकते हैं, उस आसन के अनुसार बैठकर मन चित को स्थिर करते हुए मंत्रों का जप करना चाहिए।

मंत्र योग

सबसे पहला मंत्र योग है। मंत्र दो शब्दों से बना है मं + त्र शब्दों से मंत्र बनता है। म शब्द से मन होता है। त्र शब्द का मतलब तरना, उबरना, निकालना होता है। अब दोनों शब्दों का यदि एक साथ व्याख्या किया जाए तो जिसको जपने से, मनन करने से, ध्यान करने से, बोलने से, पढ़ने से, लिखने से, सुनने से, मन हमारा तर जाए उसे मंत्र कहते हैं।

लय योग

दूसरा लय योग होता हैं। सबसे पहले लय का मतलब समझना चाहिए। ल + य शब्दों से लय शब्द बना है। ल शब्द से लीन हो जाना, उसी में खो जाना होता है। य शब्द का मतलब वास्तव में जहां पर मेरा शरीर नहीं है, लेकिन वहां पर हमारा मन, चित, बुद्धि चला जाता है, लीन हो जाता है, लय हो जाता है, मिल जाता है, उसे लय कहते हैं। एक उदाहरण से समझते हैं, जैसे मेरा शरीर कथा में है। लेकिन मेरा मन, बुद्धि, चित उन परम ब्रह्म परमात्मा के पास चला गया है। उनमें लय हो गया है। यदि आप भोजन कर रहे हैं, लेकिन आपका मन आपके किसी रिश्तेदार के पास चला गया है। 

जैसे कभी-कभी किसी रिश्तेदार के साथ कुछ घटना घट जाता है। तब वही बातें दिमाग पर बराबर चलती रहती है। जब भी कहीं बैठते हैं, वहीं रिश्तेदार की घटना आपके मन में याद आती है। मन आपका वहां चला जाता है, इसी को लय होना कहते हैं। लय योग में व्यक्ति का शरीर पृथ्वी पर होता है, घर परिवार रिश्तेदार के होता है, लेकिन उसका मन, बुद्धि, चित बराबर सदैव खाते, पीते, जागते, बैठते समय भी परमात्मा के साथ जुड़ा रहता है उसे लय योग कहते हैं।

हठ योग

तीसरा हठ योग होता हैं। सामान्य भाषा में हठ का मतलब दृढ़ निश्चय करना होता है। संकल्प करना होता है। एक बार हमने जिस चीज का संकल्प कर लिया उसे पूरा करना है। सामान्य तौर पर हम लोग देखते हैं कि बहुत सारे महात्मा हैं जो हठ योग करते हैं। जैसे मौन साधना, खड़े रहकर साधना करना, अग्नि को प्रज्वलित करके साधना करना, कांटा पर सोना, पानी में खड़े रहना, तपती धूप में तप करना इत्यादि देखा जाता है। 

लेकिन हठ योग का मतलब शास्त्रों के अनुसार अपने जीभ को उल्टा करके उन परम ब्रह्म परमेश्वर का ध्यान करते हुए अपने शरीर के नाभिक से धीरे-धीरे भगवान का ध्यान करते हुए ऊपर की तरफ बढ़ना बताया गया हैं। हठ योग में अपने दोनों नासिकाओं के माध्यम से योग करने को भी बताया गया है। एक नाक से श्वास लेना, जिसके बाद श्वास को कुछ देर तक रोकना फिर दूसरे नाक से श्वास को छोड़ना बताया गया हैं। इस क्रिया को करते समय उन परम ब्रह्म परमात्मा का ध्यान करने को भी बताया गया है। इस प्रकार से हठ योग करना चाहिए।

हठयोग में साधक को अपने नाभि से नीचे भगवान के रूप, नाम, स्वरूप, लीला का ध्यान करते हुए धीरे-धीरे उन स्वरूपों का ध्यान उच्चारण करते हुए ऊपर की तरफ आना चाहिए। जिसके बाद अपने हृदय में भगवान के नाम स्वरूप लीला को एकाग्रचित करना चाहिए। इस प्रकार से हठ योग किया जाता है। शास्त्रों में हठ योग के बारे में बताया गया हैं।

राज योग

चौथा राजयोग होता है । राजयाेग का मतलब ऐसा योग जिसमें चलने के लिए कई मार्ग दिखाई पड़ते हैं। एक मार्ग यदि बाधित भी हो जाए, तब भी दूसरे मार्ग से हम यात्रा कर सकते हैं। जैसे 10 लेन का रोड है, उनमें से यदि एक लेन बंद भी हो गया है, तब भी हम दूसरे लेन से अपनी यात्रा को जारी रख सकते हैं। उसे राज योग बताया गया है। जैसे साधन संसाधन के साथ जीवन व्यतीत करते हुए भगवान के नाम, गुण, लीला की पूजा, चर्चा, उच्चारण करते हुए, अपनी दिनचर्या को करना राजयोग बताया गया। यह सामान्य मानवों के लिए सबसे श्रेष्ठ योग है।

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