श्री लक्ष्मी नारायण महायज्ञ के लिए परमानपुर में हुई महा बैठक 

श्री लक्ष्मी नारायण महायज्ञ के लिए परमानपुर में हुई महा बैठक – परमानपुर चातुर्मास्य व्रत स्थल पर भारत के महान मनीषी संत श्री लक्ष्मी प्रपन्‍न जीयर स्वामी जी महाराज के मंगला अनुशासन में यज्ञ समिति परमानपुर के द्वारा लगभग 55 गांव के प्रतिनिधियों का महा बैठक हुआ। जिसमें श्री लक्ष्मी नारायण महायज्ञ की तैयारी को लेकर बैठक किया गया। श्री स्वामी जी के चातुर्मास्य व्रत के उपलक्ष में 1 अक्टूबर से 7 अक्टूबर तक श्री लक्ष्मी नारायण महायज्ञ का आयोजन सुनिश्चित हुआ है। जिसको लेकर के युद्ध स्तर पर तैयारी की जा रही है। रोहतास, भोजपुर, बक्सर जिला के परमानपुर चातुर्मास्य व्रत स्थल से सटे लगभग चारों तरफ की 20 किलोमीटर की दूरी में मौजूद सभी गांव के भक्त श्रद्धालु शामिल हुए।

अलग-अलग गांव से आए सभी लोगों ने अपने विचार साझा किए। जिससे महायज्ञ का आयोजन में जो भी व्यवस्थाएं हैं, उसको बेहतर तरीके से व्यवस्थित की जा सके। परमानपुर चातुर्मास व्रत यज्ञ समिति के तरफ से ग्रामीण स्तर, पंचायत स्तर एवं 20 किलोमीटर के दायरे में मौजूद सभी गांव के स्तर पर यज्ञ की तैयारी को लेकर महा अभियान चलाया जा रहा है। जिसमें यज्ञ के लिए जो भी जरूरी सहयोग है, उसके लिए स्वयं लोग काम कर रहे हैं। ताकि उसको सही तरीके से व्यवस्थित किया जा सके। यज्ञ समिति के द्वारा आयोजित बैठक में यज्ञ समिति के अध्यक्ष, सचिव, कोषाध्यक्ष, मुख्य संरक्षक, सभी संरक्षक, उपसचिव, उपाध्यक्ष, और सभी उप कोषाध्यक्ष सहित सभी सदस्य शामिल हुए।

श्री लक्ष्मी नारायण महायज्ञ के लिए परमानपुर में हुई महा बैठक 

इस महा बैठक में सभी लोगों ने एक स्वर में श्री लक्ष्मी नारायण महायज्ञ को सफल बनाने के लिए तन मन एवं धन से सहयोग हेतु निरंतर कार्य करने की सहमति प्रदान किए। 7 अक्टूबर को अखिल भारतीय महा धर्म सम्मेलन का भी आयोजन होने वाला है। जिसमें अंतरराष्ट्रीय राष्ट्रीय संत महात्मा शामिल होंगे। एक ही मंच पर भारत के उन दिव्य महापुरुषों का दर्शन एवं आशीर्वचन श्रवण करने का भी अवसर प्राप्त होगा।

shree lakshami narayan mahayagya ke liye hui mahabaithak

सती गई पिता के यज्ञ में शामिल होने

स्वामी जी ने श्रीमद् भागवत कथा प्रसंग अंतर्गत व्यास जी को सुखदेव जी, राजा दक्ष एवं भगवान शंकर के आपसी मनमुटाव में किस प्रकार से सती को अपमानित होना पड़ा, उसकी कथा को गंगा के पावन तट पर सुना रहे हैं। पिछले दिन शंकर जी को प्रयागराज में आयोजित अभिनंदन समारोह में राजा दक्ष के द्वारा अपमानित किया गया था। जिसके बाद राजा दक्ष शंकर जी को अपमानित करने के लिए बड़े यज्ञ का आयोजन कर रहे हैं। उस यज्ञ में सती जाने के लिए शंकर जी से आज्ञा मांग रही है। लेकिन शंकर जी सती को जाने के लिए अनुमति नहीं दे रहे हैं। 

वही सती बिना आज्ञा के अपने पिता के यज्ञ में शामिल होने के लिए जा रही हैं। वहां जाने के बाद सबसे पहले सती का अपने बहनों से भेंट होता है। सती के बहनों के द्वारा सती जी को बहुत कुछ सुनाया जाता है। सती की बहन कहती हैं, तुम्हारा पति दिनभर सांपों के साथ रहता है। उसका व्यवहार भी अलग है। चलो ठीक है तुम आ गई, लेकिन उस शंकर को लेकर नहीं आई, जो दिन भर भयंकर जीवन के साथ रहता है। सती जी वहां से आगे बढ़ती है। यज्ञशाला में प्रवेश करती है। जहां पर सती के पिता प्रजापति राजा दक्ष यजमान के रूप में बैठे हुए हैं। 

राजा दक्ष ने सती को अपमानित किया

प्रजापति राजा दक्ष सती को देखते हैं। कई प्रकार के अशुभनीय बात बोलना शुरू कर दिए। राजा दक्ष ने कहा सती और शंकर को तो हमने निमंत्रण भी नहीं दिया था। यह अशुभ लोग पता नहीं कैसे यहां तक पहुंच गए हैं। शंकर के जैसा ही सती का भी व्यवहार आचरण हो गया है। कई प्रकार से प्रजापति राजा दक्ष ने सती को अपमानित किया। जिसके बाद सती भी काफी गुस्से में हो गई। वह भी अपने पिता राजा दक्ष को खूब सुनाती है। कहती है तुम हमारे पिता बनने लायक नहीं थे। लेकिन गलती से मेरा जन्म तुम्हारे घर में हो गया। इस प्रकार से बहुत कुछ वाद विवाद हुआ। 

जिसके बाद सती वहीं हवन कुंड में अपने शरीर को त्याग कर देती हैं। ऐसा अन्य पुराणों में बताया गया है, लेकिन श्रीमद् भागवत में इसकी चर्चा नहीं की गई है। अन्य पुराणों में बताया गया है कि सती जब अपने शरीर का त्याग उस यज्ञ मंडप में कर देती हैं। उसके बाद इस बात की जानकारी शंकर जी को होता है। वही शंकर जी गुस्से में सती के शरीर को उठाकर के पूरे धरती पर घुमाते हैं। जहां-जहां सती के अंग जो जल गए थे और टूट करके गिरे वहीं शक्तिपीठ के नाम से जाना गया हैं। जैसे विंध्यवासिनी, वैष्णो देवी इत्यादि शक्तिपीठ को आप जानते हैं।

सती ने शरीर का त्याग किया

वही श्रीमद् भागवत के अनुसार जब सती अपने शरीर का त्याग कर दी, उसके बाद शंकर जी के गणों ने यज्ञ को पूरी तरीके से विधवंस कर दिया। राजा दक्ष समेत उनके सभी लोगों को मारा पीटा गया। उसके बाद नारद जी ने इस बात की जानकारी शंकर जी को दिए। ब्रह्मा जी, विष्णु भगवान को दिए। देवता लोग ब्रह्मा जी के पास गए कि महाराज यज्ञ विधवंस हो गया है। उस यज्ञ को पूरा करना चाहिए। 

जिसके बाद ब्रह्मा जी देवता लोग समेत शंकर जी के पास पहुंचे हैं, शंकर जी एवं ब्रह्मा जी सभी देवता लोग विष्णु भगवान के पास गए। जिसके बाद ब्रह्मा, विष्णु, महेश एवं सभी देवता लोग वापस यज्ञस्थल पर पहुंचते हैं। एक बार पुन: सभी चीजों को व्यवस्थित करके यज्ञ को पुनः प्रारंभ किया जाता है। जिसके बाद राजा दक्ष दूसरी बार जब यज्ञ में यजमान बनते हैं तो शंकर जी ब्रह्मा जी और विष्णु भगवान तीनों लोगों की स्तुति करते हैं। जिसके बाद सही तरीके से यज्ञ को पूरा किया जाता है।

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