भगवान के भक्त का अपमान माफी योग्य नहीं : श्री जीयर स्वामी जी महाराज 

भगवान के भक्त का अपमान माफी योग्य नहीं : श्री जीयर स्वामी जी महाराज – परमानपुर चातुर्मास्य व्रत स्थल पर भारत के महान मनीषी संत श्री लक्ष्मी प्रपन्‍न जीयर स्वामी जी महाराज ने कहा कि भगवान के भक्तों के साथ किए गए अपराध का माफी नहीं होता है। वैसे शास्त्रों में कई प्रकार के अपराध बताए गए हैं। जिसमें भगवान के भक्तों के साथ जो अपराध किया जाता है, उसका दंड भोगना पड़ता है। उसके बाद भगवान माफ करते हैं।

श्रीमन नारायण अपने भक्तों के अपमान को सहन नहीं करते हैं। भगवान के जो भक्त हैं, उनके साथ अमर्यादित व्यवहार करना, परेशान करना, प्रताड़ित करना, व्यंग करना बहुत बड़ा अपराध माना गया है। जिसका माफी नहीं है। जाने अनजाने में कुछ गलती होने पर उसकी माफी हो जाती है। लेकिन जान बूझकर किया गया गलती या अपराध का दंड भोगना ही पड़ता है।

भगवान के भक्त का अपमान माफी योग्य नहीं

भगवान के भक्तों की रक्षा करने के लिए स्वयं भगवान श्रीमन नारायण कई बार अवतार लिए हैं। प्रहलाद जी की रक्षा करने के लिए भगवान ने खंभे से अवतार ले लिया था। प्रहलाद जी के पिता के द्वारा मारने के लिए कई षड्यंत्र रचा गया था। उस समय भगवान ने खंभे से प्रकट होकर अपने भक्त की रक्षा किए थे। भगवान के लिए मेवा, मिष्ठान, पकवान उतना ज्यादा प्रिया नहीं है, जितना भगवान के भक्त प्रिय हैं। भगवान अपने भक्तों के लिए सबसे पहले पहुंचते हैं। 

द्रौपदी को जब भरी सभा में निर्वस्त्र करने के लिए वस्‍त्र खींचा जा रहा था, उस समय भी द्रोपदी ने भगवान श्री कृष्ण का स्मरण किया था। भगवान श्री कृष्ण अपने भक्त द्रोपदी की लाज बचाने के लिए साड़ियों का ढेर लगा दिए थे। ऐसे भगवान श्रीमन नारायण के भक्तों पर किया गया अपराध का बहुत बड़ा दंड भोगना पड़ता है।

49 अग्नि देव के रूप

श्रीमद् भागवत कथा अंतर्गत राजा पृथु के पांच संतान हुए। जिनका नाम विजिताश्व, धूम्रकेश, हर्यक्ष, द्रविण और वृक हुए। विजिताश्व का पहला विवाह श्रीखंडी के साथ हुआ था। जिनसे तीन पुत्र हुए। जिनका नाम पावन, पौमान और सूची हुआ। यह तीनों लोग अग्नि के अंशाअवतार थे। एक समय में वशिष्ठ ऋषि के द्वारा अग्नि देव को श्राप दिया गया था। कि मनुष्‍य के रूप में 3 जन्‍म लेना। वही विजिताश्व के तीन पुत्रों के रूप में अग्नि देव हुए।

इन तीन पुत्रों के द्वारा 15 – 15 पुत्र हुए। जिनकी कुल पुत्रों की संख्या 45 हुआ तथा अग्नि देव के तीन पावक, पौमान और सूची को मिलाकर के 48 हुए। एक अग्नि देव हुए, कुल मिलाकर के 49 अग्नि देव हुए। यही 49 अग्नि देव जब लंका में हनुमान जी लंका को जला रहे थे तब मर्द  49 अग्नि दिखाई पड़ रहे थे।

bhagwan ke bhakt ka apaman maphi yogya nahi hota hai

विजिताश्व का दूसरा विवाह भी हुआ था। जिससे हविर्धान रूपी पुत्र हुए। हविर्धान के पुत्र बरहीसत हुए। बरहीसत इतना ज्यादा यज्ञ किए जिसके कारण उनका नाम प्राचीन वरही पड़ गया। प्राचीन बरही का विवाह समुद्र की कन्या सवर्ण जिनको कुछ शास्‍त्रों में शतदुति के नाम से भी जाना जाता है।

पूजा कैसे करना चाहिए

प्राचीन वरही कई प्रकार के यज्ञ कर रहे थे। उसमें बली हिंसा इत्यादि भी पूजा पाठ में होता था। वही एक दिन नारद जी आए। जिनके द्वारा प्राचीन वरही को कई उपदेश दिया गया। नारद जी ने प्राचीन वरही को पूजा पाठ यज्ञ इत्यादि में हिंसात्मक पूजा को गलत बताया। नारद जी ने कहा कि यज्ञ में सात्विक पूजा होना चाहिए। 

वहीं नारद जी पूजा पाठ भक्ति का उपदेश दिए। पूजा कैसे करना चाहिए। भगवान के भक्तों के साथ किस प्रकार का आचरण रखना चाहिए, इत्यादि का बहुत उपदेश नारद जी के द्वारा दिया गया। जिसके बाद प्राचीन वरही पूजा पाठ की प्रणाली बदल दिए। जिसके बाद सात्विक तरीके से यज्ञ पूजा पाठ इत्यादि को करना प्रारंभ किए। वहीं आगे चलकर के प्राचीन वरही के 10 पुत्र हुए। उनके 10 पुत्रों का नाम 10 प्रचेता बताया गया है।

आगे चलकर प्रचेता का विवाह मारिषा से हुआ। जिनके पुत्र प्रचेता दक्ष हुए। वही प्रचेता दक्ष के 10000 पुत्र हुए। जिनको नारद जी के द्वारा संयासी बना दिया गया। इस बात की जानकारी जब प्रचेता दक्ष को हुआ, तब प्रचेता दक्ष ने नारद जी को श्राप दे दिया कि आप एक स्थान पर नहीं रह सकते हैं। एक बार पुनः प्रचेता दक्ष के 1000 पुत्र हुए, उन 1000 पुत्रों को भी नारद जी के द्वारा साधु बना दिया गया। प्रचेता दक्ष के सभी 11000 पुत्रों को साधु बना दिया गया।

नारद जी को श्राप मिला

जिसके बाद नारद जी ने भी प्रचेता दक्ष को श्राप दे दिया कि आपको अब पुत्र नहीं होगा। वही आगे चलकर प्रचेता दक्ष को 60 पुत्रियां हुई। जिन पुत्री में 15 पुत्री का विवाह चंद्रमा के साथ हुआ। कुछ पुत्री का विवाद धर्म के साथ हुआ। कुछ पुत्री का विवाह पीतर देवता के साथ हुआ। इस प्रकार से 60 पुत्री का विवाह प्रचेता दक्ष के द्वारा किया गया।

इस प्रकार से मनु एवं शतरूपा के वंश परंपरा में उत्तानपाद के वंश परंपरा का इतिहास मैत्रीय जी और विदुर संवाद को गंगा के पावन तट पर शूकदेव जी ने राजा परीक्षित को बताया। आगे मनु और शतरूपा के बड़े पुत्र प्रियव्रत जो जन्म के बाद ही जंगल में चले गए थे। आगे चलकर के वह तपस्या साधना करके एक बार पुनः अपने राज्य वापस आए हैं। जिनकी आगे की कथा जो है किस प्रकार से प्रियव्रत राजकाज की व्यवस्था संभालते हैं, उसकी कथा अगले दिन श्रवण किया जाएगा।

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