आज आम जनता की हकीकत सुनाएँ तो कहाँ सुनाएँ? इस दर्द का इलाज कहाँ संभव है? आज एक बड़ा सवाल आम लोगों के बीच खड़ा है। हम अपना दर्द सुनाएँ तो कहाँ सुनाएँ? कोई सुनने वाला तैयार नहीं है। कहानी सुनाने वाला तैयार भी है, तो भी सुनवाई नहीं होती। साहब, आखिर हम करें तो क्या करें? यह दर्द हर एक गरीब का है, हर एक मजबूर का है, जिसकी पहुँच ऊपर तक नहीं है। जो एक आम नागरिक है, उसकी आवाज दब जा रही है।
आज आधुनिक युग में सिस्टम बदल गया, व्यवस्थाएँ बदल गईं, सब कुछ डिजिटल हो गया, लेकिन भ्रष्टाचार अभी तक नॉन-डिजिटल है, जिसके लिए ऑनलाइन कोई व्यवस्था नहीं है। ऑनलाइन व्यवस्था को व्यवस्थित करने के लिए भी पहले ऑफलाइन मोड में व्यवस्थाएँ करनी पड़ रही हैं। हर जगह बिना लेन-देन के बात नहीं होती। बात होती भी है तो काम नहीं होता। आखिर व्यवस्था कब तक सुधरेगी?
एक आम नागरिक की समस्याएँ उसके रहन-सहन, शिक्षा और पहनावे से तय हो रही हैं। अगर कोई गाँव का आम नागरिक किसी कार्यालय में अपनी समस्या लेकर जाता है, तो उसे सही तरीके से जानकारी देने वाला कोई जिम्मेदार व्यक्ति नहीं मिलता। बल्कि अगर वह कहीं शिकायत कर दे, तो उसी के ऊपर कुछ आरोप लगा दिए जाते हैं।
लोकतंत्र में क्या जनता केवल वोट देने के लिए ही मालिक है? उसके बाद उसके जितने भी जरूरी काम हैं, उनके लिए उसे राजतंत्र जैसी व्यवस्थाओं का सामना करना पड़ रहा है। अंचल कार्यालय हो या अन्य कार्यालय, वहाँ के अधिकारी किसी आम व्यक्ति से उसके काम के बारे में सही तरीके से बात नहीं करते। बात करते भी हैं, तो उनका काम नहीं करते।
क्योंकि जब तक आगे-पीछे चलने वाले कुछ लोग अपनी जेब गर्म नहीं करेंगे, तब तक आम लोगों का काम नहीं होगा। सब कहते हैं कि हम जिस कुर्सी पर बैठे हैं, वह कुर्सी ऐसे ही नहीं मिली है। इसके लिए हमने बहुत मेहनत की है, पढ़ाई की है, रात-दिन परिश्रम किया है और फिर इस कुर्सी को प्राप्त किया है। इसलिए तुम एक सामान्य नागरिक हो, हम एक अधिकारी हैं, हमसे बात करने की तहजीब सीखो।
लेकिन साहब, चाहे आपने पढ़ाई की, मेहनत की और एक बड़े अधिकारी बन गए, लेकिन जो वेतन आपको सरकार देती है, वह पैसा देश के आम लोगों का है। देश का हर व्यक्ति किसी-न-किसी रूप में सरकार को टैक्स देता है। इसी पैसे से सरकार व्यवस्थाएँ संचालित करती है तथा अधिकारी, पदाधिकारी, कर्मचारी और पेंशनरों को वेतन एवं पेंशन प्रदान करती है। लेकिन आपको अपनी कुर्सी पर बहुत ज्यादा अभिमान रहता है। यह देश की आम जनता जिस दिन जाग गई, उस दिन देश से पूरे भ्रष्टाचार को खत्म कर देगी।
राजस्व विभाग हो, पुलिस प्रशासन हो या अन्य विभाग, आम लोगों के साथ सामान्य तरीके से बातचीत की प्रक्रिया होनी चाहिए तथा उनके कार्यों के लिए व्यवस्थाएँ पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए। लेकिन जब पटना जैसे बड़े शहर में वाहन चेकिंग के दौरान किसी बाइक सवार को रोककर उसके वाहन के कागजात की जाँच होती है और किसी एक कागज की कमी होती है, तो ट्रैफिक पुलिस के जवान कहते हैं, “आपका प्रदूषण प्रमाण-पत्र फेल है। भाई साहब, आपका ₹3000 का चालान कट जाएगा, लेकिन हम ₹1000 में मैनेज कर देंगे।” बाइक सवार कहता है, “ठीक है, कैसे मैनेज होगा?” ट्रैफिक पुलिस वाला कहता है, “इधर आइए।”
यह घटना पटना के एग्जीबिशन रोड चौराहे पर बृहस्पतिवार दोपहर लगभग 3 से 4 बजे के बीच की है, जहाँ ट्रैफिक पुलिस चौराहे पर बनी एक छोटी-सी चौकी के अंदर ले जाकर कहती है, “₹1000 दे दीजिए, आपका चालान नहीं कटेगा।” बाइक सवार कहता है, “चालान की रसीद दीजिए।” तब जवाब मिलता है, “नहीं-नहीं, चालान की रसीद नहीं मिलेगी। हम तो आपका काम मैनेज कर रहे हैं, नहीं तो ₹3000 का फाइन कटेगा।”
सोचा जा सकता है कि जब पटना जैसे बड़े शहर में भी बीच सड़क यदि किसी व्यक्ति के वाहन के कागजात नहीं हैं, तो उसकी चालान काटने की प्रक्रिया होनी चाहिए। लेकिन वहाँ भी भ्रष्टाचार हावी है और पुलिस वाले पैसे की उगाही में लगे हुए हैं। अंचल कार्यालय हो, वाहन चेकिंग हो, परिमार्जन हो, दाखिल-खारिज हो, जमीन का सुधार हो या अन्य विभागों से जुड़ा कोई काम—हर जगह, हर काम के लिए पैसा माँगा जा रहा है।
आम नागरिक इस लचर व्यवस्था के सामने बेबस हो जाता है, क्योंकि वह जानता है कि व्यवस्थाओं को व्यवस्थित करना केवल अधिकारियों और सिस्टम के माध्यम से ही संभव है। लेकिन जब सिस्टम में बैठे लोग अपनी मनमर्जी से काम करें और बिना चढ़ावे के कोई कार्य आगे न बढ़े, तब आम आदमी के सामने दो ही रास्ते बचते हैं। या तो वह भ्रष्टाचार को स्वीकार कर अपना काम करवाए, या फिर अपना काम छोड़कर कार्यालयों के चक्कर लगाता रहे। क्योंकि उसके पास दूसरा कोई उपाय नहीं बचता।
सबसे ज्यादा यदि कहीं भ्रष्टाचार है, तो अंचल कार्यालय में है। बिहार के सभी अंचल अधिकारियों और कर्मचारियों की यदि जाँच कराई जाए, तो उनकी जितनी सैलरी है, उसके हिसाब से आय से अधिक संपत्ति जरूर पाई जा सकती है। लेकिन यह जाँच करेगा कौन? कहीं एक व्यक्ति भ्रष्टाचार में लिप्त हो, तब न उस पर जाँच या कार्रवाई हो। यहाँ तो पूरा सिस्टम ही भ्रष्टाचार से भरा हुआ है। आखिर जाँच कराई जाए तो किसकी कराई जाए? जाँच करेगा भी तो कौन? जब व्यवस्थाएँ ही पूरी तरह भ्रष्ट हो चुकी हों, तो वहाँ बदलाव कैसे होगा?
अभी-अभी सुनने में आया कि बिहार के राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग द्वारा जिन अधिकारियों का अंचलों से स्थानांतरण किया गया है, वे समय पर अपना पदभार नहीं बदल पा रहे हैं। आज ऐसा लगता है कि विभाग का अधिकारियों पर न तो कोई अनुशासन है और न ही किसी प्रकार का भय। कुछ दिन पहले बिहार के राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री विजय कुमार सिंन्हा बनाए गए थे।
उस समय उन्होंने विभाग की व्यवस्थाओं को पूरी तरह सही करने का प्रयास किया, लेकिन उन्हीं पर भ्रष्ट तंत्र हावी हो गया और दोबारा उनका विभाग ही बदल दिया गया। आखिर जब किसी व्यक्ति को किसी विभाग की जिम्मेदारी दी जाती है और फिर उसका विभाग ही बदल दिया जाता है, तो विभाग के अंदर डर और जवाबदेही कैसे तय होगी? यह आम लोगों की बहुत बड़ी पीड़ा है, जिसका समाधान शायद ईश्वर ही तय करेंगे।

रवि शंकर तिवारी एक आईटी प्रोफेशनल हैं। जिन्होंने अपनी शिक्षा इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी स्ट्रीम से प्राप्त किए हैं। रवि शंकर तिवारी ने डॉ एपीजे अब्दुल कलाम टेक्निकल यूनिवर्सिटी लखनऊ से एमबीए की डिग्री प्राप्त किया हैं।