जमीन की जमाबंदी रद्द करने को लेकर पटना हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

पटना हाईकोर्ट ने जमीन की जमाबंदी रद्द करने के मामले में एक बड़ा फैसला सुनाया है। दरभंगा से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की।

मामले के अनुसार, एक व्यक्ति की मृत्यु के बाद उनके नाम पर पिछले लगभग 80 वर्षों से चली आ रही जमाबंदी को रद्द करने की अनुशंसा अंचलाधिकारी (सीओ) द्वारा की गई। शिकायतकर्ता का कहना था कि उक्त जमीन की जमाबंदी लगभग 80 वर्षों से चली आ रही थी। व्यक्ति की मृत्यु के बाद अंचलाधिकारी ने जमाबंदी रद्द करने की प्रक्रिया शुरू की, जिसके बाद एडीएम (ADM) द्वारा जमाबंदी रद्द कर दी गई। अंचलाधिकारी का कहना था कि पहले उस जमीन पर पोखर था।

इसी मामले की सुनवाई पटना हाई कोर्ट में हुई। सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि यदि किसी जमीन की जमाबंदी रद्द करनी है, तो इसके लिए सक्षम दीवानी न्यायालय (Civil Court) में वाद दायर किया जाना चाहिए।

हाई कोर्ट ने बिहार सरकार के संबंध में भी कहा कि यदि सरकार को लगता है कि किसी जमीन की जमाबंदी रद्द करने की आवश्यकता है, या वह जमीन सरकारी है अथवा किसी अन्य कारण से जमाबंदी रद्द की जानी चाहिए, तो इसके लिए भी सक्षम दीवानी न्यायालय में ही वाद दायर करना होगा।

इस फैसले के बाद बिहार के बहुत से लोगों को राहत मिलने की संभावना है। क्योंकि बिहार में जमीन सर्वे शुरू होने के बाद लगातार कई जमीनों की जमाबंदी लॉक की गई है, वहीं कई मामलों में जमाबंदी रद्द कर जमीन को सरकारी घोषित कर दिया गया। दूसरी ओर, बिहार में ऐसे भी कई मामले हैं, जिनमें जमीन का पहला सरकारी रिकॉर्ड किसी अन्य स्थिति को दर्शाता है, लेकिन बाद में वह जमीन किसी रैयत के नाम पर दर्ज हो गई। ऐसे मामलों में अंचलाधिकारी की भूमिका को लेकर भी कई विवाद सामने आते रहे हैं।

अब इस फैसले के बाद किसी भी जमीन की जमाबंदी रद्द करने के लिए, हाई कोर्ट के अनुसार, सक्षम दीवानी न्यायालय में वाद दायर कर विधिसम्मत प्रक्रिया अपनानी होगी। कोर्ट का कहना है कि जब दोनों पक्ष न्यायालय के समक्ष अपना-अपना पक्ष और साक्ष्य प्रस्तुत करेंगे, तभी यह तय किया जाएगा कि संबंधित जमीन की जमाबंदी रद्द की जानी चाहिए या नहीं। बिना विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए किसी भी जमीन की जमाबंदी रद्द करना न्यायसंगत नहीं है।

इस मामले में एडीएम द्वारा रद्द की गई जमाबंदी को भी पटना हाई कोर्ट ने निरस्त करते हुए उसका आदेश रद्द कर दिया।

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