श्रीमद् भागवत महापुराण का महात्म्य

श्रीमद् भागवत महापुराण शब्द के महत्त्व को सबसे पहले समझना चाहिए। ‘श्री’ शब्द ऐश्वर्य का सूचक है। ‘श्री’ शब्द आदर्श का सूचक भी है। किसी भी ग्रंथ, पुराण, पुस्तक अथवा व्यक्ति के नाम के पहले ‘श्री’ शब्द का प्रयोग करने से उस ग्रंथ, पुराण, पुस्तक अथवा व्यक्ति का महत्त्व बढ़ जाता है।

‘मद्’ शब्द का अर्थ आनंद और हर्ष होता है। यदि ‘श्रीमद्’ शब्द की एक साथ व्याख्या की जाए, तो जिस शब्द से ईश्वर हर्ष और आनंद का अनुभव करते हैं, उसे ‘श्रीमद्’ कहा जाता है।

‘भागवत’ शब्द को अलग-अलग शब्दों के आधार पर समझने पर इसके अर्थ और भाव को समझा जा सकता है। ‘भा’ शब्द से ज्ञान का बोध होता है। इसके भाव को समझने से ज्ञान और मार्गदर्शन प्राप्त होता है। दूसरा शब्द ‘ग’ है, जिसका अर्थ गौरव होता है। तीसरा शब्द ‘व’ है, जिसको सुनने, समझने या समझाने से वैभव की प्राप्ति होती है। चौथे शब्द ‘त’ का अर्थ तेज की अनुभूति प्राप्त होना है। इन सभी भावों को समाहित करने वाले ग्रंथ को ही ‘भागवत’ कहा जाता है।

अब यदि एक पंक्ति में ‘भागवत’ का अर्थ समझा जाए, तो ऐसी पुस्तक, पुराण या धार्मिक ग्रंथ, जिसको पढ़ने, सुनने, कहने और समझाने से ज्ञान, गौरव, वैभव और तेज की प्राप्ति होती हो, उसे ‘भागवत’ कहा जाता है।

‘पुराण’ शब्द का अर्थ पुराना होता है। ऐसा ग्रंथ जो बहुत पुराना है, जिसकी रचना कई हजार वर्ष पहले हुई थी, लेकिन जब भी उसको पढ़ा जाए, सुना जाए, कहा जाए या समझा जाए, तो हर बार नई चीज का अनुभव, नए ज्ञान का अनुभव और नए मार्गदर्शन का अनुभव प्राप्त होता हो, उसे ‘पुराण’ कहते हैं।

श्रीमद् भागवत महापुराण की रचना पराशर ऋषि के पुत्र वेदव्यास जी के द्वारा की गई थी। यह एक ऐसा धार्मिक ग्रंथ है, जिसके श्रवण मात्र से जीव का कल्याण होता है। इस ब्रह्मांड में जितने भी प्रकार के जीव हैं, चाहे वह मानव हो, दानव हो, पशु हो, पक्षी हो या अन्य कोई जीव हो, इस धार्मिक ग्रंथ का श्रवण करने से ही कल्याण हो जाता है।

यदि कोई भी व्यक्ति इस नियम के अनुसार श्रद्धापूर्वक पूरी श्रीमद् भागवत कथा का श्रवण करता है, तो उसे जीवन में शांति का अनुभव होता है। श्रीमद् भागवत में कहा गया है कि सत्य ही ईश्वर है और सत्य ही सर्वोत्तम औषधि है। इसीलिए हर परिस्थिति में सत्य को धारण करना चाहिए।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—हे अर्जुन! जो जैसा कर्म करता है, वैसा ही उसे फल प्राप्त होता है। इसलिए हमेशा अच्छे कर्म करने चाहिए। श्रीमद् भागवत के माध्यम से ही हम सभी लोगों को यह संदेश प्राप्त होता है कि हमें अपने जीवन में अपने कर्मों के प्रति विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता है, क्योंकि कर्म ही मनुष्य का सबसे बड़ा और प्रमुख धर्म है।

श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि कर्म करो, फल की इच्छा छोड़ दो। इसलिए आज कलियुग में तो हम सभी लोगों को अपने कर्म पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है, क्योंकि आज कुछ लोगों को लगता है कि बिना कर्म किए ही सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है। थोड़ा-बहुत भी इधर-उधर कुछ हो जाता है, तो उनके मन में भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। उन्हें ऐसा लगने लगता है कि दुनिया में ईश्वर नहीं है।

लेकिन ईश्वर भी कहते हैं कि यदि तुम हमें याद करते हो, तो हम तुम्हारे भाव को भी समझते हैं और तुम्हारे कर्म को भी देखते हैं। तुम्हें ऐसा लगता है कि ईश्वर मुझे नहीं देख रहे हैं, लेकिन हम तुम्हारे एक-एक पल में किए गए कर्मों का पूरा हिसाब-किताब रखते हैं। इसीलिए तुम जहाँ हो, जिस स्थिति में हो और जो भी कर्म कर रहे हो, उस कर्म को विवेकपूर्ण होकर, सोच-समझकर करो।

क्योंकि इस पूरी दुनिया में यदि कोई सबसे चतुर प्राणी है, तो वह मनुष्य है। मनुष्य के पास दिमाग है और भगवान ने उसे बुद्धि एवं विवेक प्रदान किया है। इसलिए भगवान मनुष्य को स्वतंत्र रूप से भी छोड़ते हैं कि वह अपने दिमाग और मस्तिष्क का उपयोग करके गलत और सही का निर्णय स्वयं करे।

क्योंकि कहा जाता है कि ईश्वर ही सब कुछ करते हैं। यह बात सही है कि ईश्वर की प्रेरणा से ही सब कुछ होता है, लेकिन ईश्वर कहते हैं कि मनुष्य ने इस पूरे ब्रह्मांड में सबसे श्रेष्ठ योनियों में जन्म लिया है। वह ऐसा प्राणी है, जिसके पास सृष्टि की रचना करते समय ब्रह्मा जी ने सोचने-समझने की शक्ति प्रदान की है।

भगवान कहते हैं कि जब बालक जन्म लेने वाला होता है, उससे पहले जब वह माँ के गर्भ में रहता है, तो वहाँ ईश्वर उसकी रक्षा करते हैं और उसे धर्म की भी शिक्षा देते हैं। उस समय जीव भगवान से कहता है—हे भगवान! हमें इस नरक से निकाल दीजिए, हम आपकी भक्ति करेंगे। लेकिन जैसे ही जीव धरती पर जन्म लेता है, तो वह भगवान को दिया हुआ वचन भूल जाता है।

भगवान भी उसे स्वतंत्र रूप से पृथ्वी पर छोड़ देते हैं, क्योंकि वे भी कहते हैं कि जब तुम्हें ईश्वर का दिया हुआ सुंदर शरीर, ज्ञान, बुद्धि, दो हाथ, दो पैर, पाँच ज्ञानेंद्रियाँ, पाँच कर्मेंद्रियाँ और उनका नियंत्रण करने वाला एक मन भी हमने दिया है, तो तुम अपने मन और इंद्रियों को कहाँ लगा रहे हो, यह तुम स्वयं विचार करो और उसी के अनुसार हम तुमको फल भी देंगे।

इसीलिए जब व्यक्ति सुख में होता है, तो उसे ईश्वर याद नहीं आते हैं, लेकिन जब उसके ऊपर कोई विपत्ति या दुख आता है, तो उसे ईश्वर याद आने लगते हैं और वह भगवान को पुकारने लगता है। लेकिन भगवान भी कहते हैं कि हम तुम्हारे कर्मों का पूरा हिसाब-किताब रखते हैं। जब तक तुम पूर्ण समर्पण के साथ मुझे याद नहीं करोगे, तब तक हम तुम्हारी सहायता नहीं करेंगे।

छल, कपट, चोरी, बेईमानी, प्रपंच और झूठ के चक्कर में एक इंसान फँस सकता है और उसे फँसाया भी जा सकता है, लेकिन ईश्वर इस पूरी दुनिया का संचालन करते हैं। उनसे कुछ भी छिपा नहीं है। चाहे हम जो कुछ भी करें, उसकी पूरी सूचना उनके पास होती है।

इसीलिए इस श्रीमद् भागवत महापुराण में व्यक्ति के जन्म, कर्म और मृत्यु से संबंधित पूरी जानकारी दी गई है, जिससे हमें अपने जीवन में क्या करना चाहिए, हमें अपने जीवन में क्या नहीं करना चाहिए, हमें किसके साथ कैसा व्यवहार रखना चाहिए, हमें कब क्या करना चाहिए, हमें क्या खाना चाहिए, हमें क्या बोलना चाहिए, हमें क्या लिखना चाहिए, हमें क्या पढ़ना चाहिए, हमें समाज के साथ कैसे रहना चाहिए—इन सभी चीजों के बारे में हम श्रीमद् भागवत महापुराण मार्गदर्शन प्राप्‍त करते हैं।

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