वैसे सामान्य तौर पर मुख्य रूप से और भी तीन प्रकार के व्यवहार की चर्चा समाज में होती है। इसके बारे में पर्सनैलिटी डेवलपमेंट स्किल में भी सिखाया जाता है। इसमें सबसे पहले असर्टिव बिहेवियर (Assertive Behaviour) होता है, जिसका मतलब दृढ़ व्यवहार होता है। इसे सबसे ज्यादा आदर्श व्यवहार भी माना जाता है, क्योंकि इसमें एक व्यक्ति दूसरे का सम्मान करते हुए अपनी बातों को भी उसके सामने रख देता है तथा दूसरे व्यक्ति को किसी भी प्रकार की ठेस न पहुँचे, उसका भी सम्मान रखा जाता है। लेकिन इसमें बात पूरी तरीके से सामने वाले व्यक्ति के सामने रखी जाती है।
एक प्रकार से यह एक सामान्य व्यवहार होता है, जिसमें न अपनी बात कहने में झिझक होती है और न सामने वाले से कोई भय होता है कि हम अगर यह बात कहते हैं तो उसको बुरा लग सकता है या फिर वह व्यक्ति भड़क सकता है। इसकी भी इसमें चिंता नहीं होती है। यही व्यवहार आज समाज में अपनाने की भी जरूरत है, क्योंकि कभी-कभी कुछ बातों को अगर जानबूझकर नहीं कहा जाता है तो सामने वाले व्यक्ति को ऐसा लगता है कि वह व्यक्ति या तो मूर्ख है या फिर उसे चीजों के बारे में जानकारी नहीं है या फिर वह किसी अन्य कारण से अपनी बातों को रख नहीं सकता है। इसीलिए मानव जीवन में असर्टिव बिहेवियर, यानी दृढ़ व्यवहार, को सबसे सर्वोपरि माना गया है।
*आक्रामक व्यवहार, जिसे अंग्रेजी में *एग्रेसिव बिहेवियर (Aggressive Behaviour) भी कहा जाता है, इसमें व्यक्ति दूसरे की बात नहीं सुनता है, बल्कि जो वह कहना चाहता है, करना चाहता है या दूसरे से भी करवाना चाहता है, वही केवल अपनी बात रखता है। किसी दूसरे की बात भी सुनेगा ही नहीं। न उसको यह समझने की आवश्यकता होती है कि क्या गलत है, क्या सही है, क्या कहना चाहिए और क्या नहीं कहना चाहिए। इसकी सोच-विचार किए बिना ही केवल अपनी भावनाओं और अपनी बातों को दूसरों के सामने तथा समाज के सामने मनवाने की भावना रखने वाला व्यक्ति केवल अपना आक्रामक व्यवहार प्रकट करता है। उसे ही एग्रेसिव बिहेवियर भी कहा जाता है, जो कि सामाजिक तौर पर बिल्कुल सही नहीं है।
एक दब्बू प्रकार का व्यवहार भी होता है, जिसको अंग्रेजी में पैसिव बिहेवियर (Passive Behaviour) कहा जाता है। इसमें व्यक्ति अपने अधिकारों के लिए कुछ कह नहीं पाता है, अपने विचार और अपनी भावनाओं को प्रकट नहीं कर पाता है और दूसरों की बात में केवल हाँ में हाँ मिलाता रहता है।
जैसे कभी-कभी कुछ लोगों से भेंट हो जाती है। वे दूसरे की बात नहीं सुनते, केवल अपनी बात सुनना चाहते हैं। अगर वैसे लोगों के साथ कभी-कभी आदमी बैठ जाता है तो उसी की बात में हाँ में हाँ मिलाना पड़ता है। वह व्यक्ति जो बातें कर रहा है, उसमें क्या सही है और क्या गलत है, आप अपनी भावनाओं को नहीं रख सकते। केवल जो वह कह रहा है, उसी में हाँ में हाँ मिलाइए। तो हाँ में हाँ मिलाने वाले व्यक्ति जो होते हैं, उनका भाव या विचार एक वैसे व्यक्ति का विचार होता है, जो पैसिव बिहेवियर यानी दब्बू व्यवहार वाला व्यक्ति होता है।
हाँ में हाँ मिलाने वाले व्यक्ति को दब्बू व्यवहार वाले व्यक्ति भी कहा जाता है, जो केवल दूसरों के गलत विचार, व्यवहार और भावना को भी सही कहता है और हाँ में हाँ मिलाता है।
आज समाज की जो स्थिति है, उसके अनुसार हर व्यक्ति को सही और गलत पर विचार करते हुए अपनी भावनाओं, विचारों और अभिव्यक्ति को स्वतंत्र रूप से प्रकट करना चाहिए। चाहे इससे किसी को बुरा लगता हो या फिर उसे किसी रिश्ते के टूटने का भी डर हो, तब भी अगर बात सही है तो उसको बेझिझक रखना चाहिए। जिसके लिए सबसे ज्यादा असर्टिव बिहेवियर, यानी दृढ़ व्यवहार, को आदर्श व्यवहार के रूप में अपनाना चाहिए।

रवि शंकर तिवारी एक आईटी प्रोफेशनल हैं। जिन्होंने अपनी शिक्षा इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी स्ट्रीम से प्राप्त किए हैं। रवि शंकर तिवारी ने डॉ एपीजे अब्दुल कलाम टेक्निकल यूनिवर्सिटी लखनऊ से एमबीए की डिग्री प्राप्त किया हैं।