कहीं भी कुछ भी हो जाए, तो आजकल सबसे पहले जाति की खोज की जाने लगी है। किस जाति के लोगों ने हत्या की? किस जाति के लोगों ने लूटपाट की? किस जाति के लोगों ने साजिश की? अपराध करने वाले व्यक्ति की जाति क्या है—आजकल इसमें सबसे ज्यादा रुचि ली जा रही है।
सबसे पहले मैं उन लोगों से कहना चाहता हूं कि आजकल ऐसी खबरें भी सुनने को मिलती हैं कि किसी लड़के ने अपनी मां को मार डाला, किसी लड़के ने अपने पिता को मार डाला, या किसी मां ने अपने बच्चे को मार डाला। तो क्या अब इन घटनाओं में भी जाति खोजी जाएगी?
अगर किसी लड़के ने अपने पिता की हत्या कर दी, तो क्या उस लड़के की जाति को अपराधी घोषित कर दिया जाए? अगर किसी मां ने अपने बच्चे की हत्या कर दी, तो क्या उस मां की जाति को भी अपराधी घोषित कर दिया जाए?
क्योंकि अगर हर चीज में जाति खोजनी है, तो घर के अंदर भी जाति खोजनी पड़ेगी।
अगर एक भाई दूसरे भाई की संपत्ति हड़पने के लिए उसकी हत्या कर देता है, तो क्या एक ही घर में दो जातियां हो जाएंगी? एक भाई अपराधी जाति का और दूसरा भाई पीड़ित जाति का?
फिर तो एक पुत्र अपराधी जाति का, एक पिता अपराधी जाति का, एक मां अपराधी जाति की और एक भाई अपराधी जाति का माना जाना चाहिए।
लेकिन ऐसा नहीं है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जो व्यक्ति अपराध करता है, उसके अपराध से पहले उसकी जाति देखना ही सबसे बड़ी गलती है।
चाहे कोई भी व्यक्ति हत्या करे या किसी भी प्रकार का अपराध करे, उसकी पहचान सबसे पहले एक अपराधी के रूप में होनी चाहिए।
वह किसी जाति का व्यक्ति बाद में है, लेकिन अपराध करने के बाद उसकी पहली पहचान *अपराधी* की है। उसकी पहचान उसके अपराध से होनी चाहिए, उसकी जाति से नहीं।
आज कुछ लोग किसी खास जाति को लेकर अपना समर्थन जताते दिखाई देते हैं। लेकिन हमें यह भी देखना चाहिए कि अपनी ही जाति और समाज के लोग एक-दूसरे के साथ कितना खड़े होते हैं।
भारत में जितनी भी जातियां हैं, हर जाति में गरीब भी हैं और संपन्न लोग भी हैं। कई बार ऐसा देखने को मिलता है कि जो लोग अपनी जाति में सबसे ज्यादा संपन्न और ताकतवर होते हैं, वे अपनी ही जाति के दूसरे लोगों को नीचा दिखाने लगते हैं।
हम जाति की बात छोड़ देते हैं और अपने घर की बात करते हैं।
एक घर के अंदर अगर दो, तीन, चार या पांच लोग रहते हैं और उनमें से कोई एक व्यक्ति सबसे ज्यादा ताकतवर या पैसे वाला हो जाता है, तो कई बार वही व्यक्ति अपने परिवार के दूसरे लोगों को नीचा दिखाने लगता है।
तो क्या यहां भी परिवार की एक अलग जाति हो जाएगी?
जो लोग जाति के ठेकेदार बनने की कोशिश करते हैं, उनसे मेरा सवाल है कि अपनी ही जाति में जो लोग गरीब हैं, उनके लिए वे कितना करते हैं?
हर जाति में गरीब लोग हैं। हर समाज में जरूरतमंद लोग हैं।
आज अगर कोई गरीब व्यक्ति परेशान है, तो उसकी मदद करने के लिए कितने लोग आगे आते हैं?
लेकिन कहीं कोई घटना या दुर्घटना हो जाए, तो अचानक इस प्रकार से दिखावा किया जाने लगता है, जैसे उस गरीब की मदद के लिए पूरा समाज उसके साथ खड़ा हो गया हो।
जब आपके पास इतनी धन-संपत्ति थी, तब आपको उस गरीब की याद क्यों नहीं आई?
अगर वास्तव में आप अपनी जाति के लोगों के हमदर्द हैं, तो पहले से ही अपने समाज के गरीब लोगों की मदद कीजिए। अपनी धन-संपत्ति में से कुछ हिस्सा निकालकर जरूरतमंद लोगों की सहायता कीजिए।
अगर कोई जाति के नाम पर अपने समाज के प्रति हमदर्दी दिखाता है, तो मेरा सवाल है कि जब कोई घटना घटती है, उसके पहले आप अपनी ही जाति के गरीब लोगों को समान अवसर क्यों नहीं देते?
क्या आप सबकी धन-संपत्ति बराबर कर सकते हैं?
क्या आप सबका ज्ञान बराबर कर सकते हैं?
क्या आप सबकी बुद्धि और विवेक बराबर कर सकते हैं?
ऐसा संभव नहीं है।
ईश्वर ने हर व्यक्ति को एक जैसा नहीं बनाया है। हर व्यक्ति की क्षमता अलग है, हर व्यक्ति का ज्ञान अलग है और हर व्यक्ति की परिस्थितियां अलग हैं।
एक व्यक्ति के हाथ में दस उंगलियां होती हैं, लेकिन वे दसों उंगलियां भी बिल्कुल एक जैसी नहीं होतीं। फिर भी सभी का अपना-अपना महत्व है।
इसी तरह एक ही परिवार में, एक ही माता-पिता की दो या तीन संतानें होती हैं, लेकिन वे सभी बिल्कुल एक समान नहीं होतीं। उनकी बुद्धि, विवेक, ज्ञान और क्षमता में अंतर होता है।
इसलिए समाज में समान सम्मान और समान अधिकार की बात तो हो सकती है, लेकिन हर व्यक्ति की स्थिति, धन-संपत्ति, ज्ञान और क्षमता बिल्कुल एक समान कर देना संभव नहीं है।
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अब उन लोगों को भी समझने की जरूरत है, जो किसी घटना के बाद हिंसा भड़काने के लिए उग्र प्रदर्शन करने लगते हैं।
कहीं पर भी कोई घटना हो जाए, तो उस घटना को अंजाम देने वाला व्यक्ति किसी जाति या समाज से पहले *एक अपराधी की श्रेणी में आता है।*
जब कोई व्यक्ति अपराध करता है, तो उसके लिए कानून की व्यवस्था है।
अब अगर कोई यह कहता है कि कानून से न्याय नहीं मिल रहा है, इसलिए अब स्वयं न्याय किया जाएगा, तो इसका मतलब है कि आप कानून को नहीं मानते।
आप भारत के संविधान के विपरीत काम करेंगे।
अगर आपको कानून या न्याय व्यवस्था से शिकायत है, तो सरकार के सामने अपनी आवाज उठाइए। न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाइए। कानूनी तरीके से अपनी बात रखिए।
*न्याय सड़क पर नहीं होगा, न्याय न्यायपालिका के कटघरे में होगा।*
अगर किसी व्यक्ति को न्यायपालिका पर विश्वास नहीं है, तो वह लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था पर ही सवाल खड़ा कर रहा है।
और यही बात जोगिया हत्याकांड में भी देखने को मिली।
5 अगस्त 2026 को जोगिया गांव में जो हत्या हुई, जिसने भी हत्या की, वह एक अपराधी है। उसके अपराध का दंड भारत के कानून और संविधान के अनुसार दिया जाना चाहिए।
लेकिन जिस प्रकार एक अपराधी ने एक व्यक्ति की हत्या की और उसके अपराध का जवाब देने के लिए एक के बदले 100, 200, 500 या हजारों लोग अपराध की राह पर चले गए, यह सरासर गलत है।
एक अपराधी ने हत्या की, तो वह अपराधी है ही।
लेकिन अगर आप भी किसी के घर में आग लगा रहे हैं, ट्रैक्टर जला रहे हैं, हार्वेस्टर जला रहे हैं, सामान जला रहे हैं, तोड़फोड़ कर रहे हैं, संपत्ति को नुकसान पहुंचा रहे हैं, लूटपाट या डकैती कर रहे हैं या हिंसा कर रहे हैं, तो यह आम जनता का काम नहीं है।
चाहे वह किसी भी जाति का व्यक्ति हो, अगर उसने ऐसा किया है तो वह अपने किए के लिए अपराधी है।
जिसने हत्या की, वह अपराधी है।
जिसने आग लगाई, वह भी अपराधी है।
जिसने लूटपाट की, वह भी अपराधी है।
जिसने तोड़फोड़ की, वह भी अपराधी है।
जिसने हिंसा की, वह भी अपराधी है।
इन सभी के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए और दोषी पाए जाने पर कानून के अनुसार सजा मिलनी चाहिए।
हमें जाति-जाति का खेल करने की जरूरत नहीं है।
समाज में भेदभाव और तनाव पैदा करने की जरूरत नहीं है।
हर घर में समस्याएं हैं। हर परिवार में किसी न किसी प्रकार के विवाद हो सकते हैं।
इसलिए अगर किसी दूसरे के घर में कोई समस्या या विवाद हो जाए, तो उसमें घी डालने का काम मत कीजिए।
क्योंकि कहा जाता है—*देर है, लेकिन अंधेर नहीं।*
आज किसी दूसरे के घर में समस्या है, कल वही समस्या आपके घर में भी आ सकती है।
इसलिए सावधान रहिए, जागरूक रहिए और समाज में मिल-जुलकर रहिए।
जहां भी कोई अपराध कर रहा है, वहां अपराधी के खिलाफ कानून के तहत सजा दिलाने के लिए प्रयास कीजिए। उसके लिए आवाज बुलंद कीजिए, लेकिन न्यायिक और कानूनी तरीके से आवाज उठाइए।
कभी भी गलत का साथ मत दीजिए और खुद भी गलत करने का प्रयास मत कीजिए।
*अपराधी की पहचान उसकी जाति से नहीं, उसके अपराध से होनी चाहिए।*
समाज को जाति के नाम पर बांटने के बजाय हमें अपराध के खिलाफ एकजुट होना चाहिए।
यही समाज के हित में है और यही कानून तथा संविधान की भावना के अनुरूप है।

रवि शंकर तिवारी एक आईटी प्रोफेशनल हैं। जिन्होंने अपनी शिक्षा इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी स्ट्रीम से प्राप्त किए हैं। रवि शंकर तिवारी ने डॉ एपीजे अब्दुल कलाम टेक्निकल यूनिवर्सिटी लखनऊ से एमबीए की डिग्री प्राप्त किया हैं।