जीवित्पुत्रिका व्रत 4 को मनाया जाएगा

जीवित्पुत्रिका व्रत माताएं अपने पुत्र की लंबी आयु के लिए करती हैं, जिससे उनके पुत्र के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और खुशहाली बनी रहे।

जीवित्पुत्रिका व्रत आज का व्रत नहीं है। यह व्रत हजारों वर्षों पहले से चला आ रहा है। इस व्रत के जो नियम पुस्तकों में बताए गए हैं और जो कथा हजारों वर्षों से माताएं सुनती और एक-दूसरे को सुनाती आ रही हैं, वह पुस्तक या कथा आज की नहीं है, बल्कि हजारों-हजार वर्ष पुरानी है।

आज पंचांग की बात की जाती है। पंचांग छह महीने या एक वर्ष पहले बनाया गया होता है, जिसमें विद्वानों ने जो निर्णय लिखा है, वह उनका अपना मत है। उन्होंने अपने मत के अनुसार उसे लिखा है। लेकिन जीवित्पुत्रिका व्रत से संबंधित जो पुस्तक और कथा है, वह एक वर्ष पुरानी नहीं है। यह कथा जब से जीवित्पुत्रिका व्रत शुरू हुआ है, तभी से चली आ रही है।

अब यदि हम उस पुस्तक और कथा को आज नहीं मानते हैं, तो इसका कोई तर्क नहीं है। आपका अपना विचार है, आप उसे मान सकते हैं। या फिर आज की विद्वत्ता और कुछ तर्क प्रस्तुत किए जा रहे हैं, जिनमें पंचांग की बात कही जा रही है या अन्य तर्क दिए जा रहे हैं—ये सभी तर्क आज के हैं, पुराने नहीं हैं।

अर्थात जो अनादि काल से चला आ रहा है, वह तर्क और तथ्य उस कथा एवं पुस्तक में लिखे हुए हैं, जिसमें साफ-साफ लिखा हुआ है कि *सप्तमी युक्त जीवित्पुत्रिका व्रत नहीं करना चाहिए।* इससे बड़ा कोई प्रमाण नहीं है।

सनातन धर्म में हम इतिहास और पुराण को ही प्रधान मानते हैं। हमारा इतिहास, पुरातन संस्कृति, सभ्यता और पुराण—यही हमारी धार्मिक परंपरा और ज्ञान का आधार हैं। उस परंपरा की अवहेलना आज हम नहीं कर सकते।

चाहे हम कितने ही अधिक शिक्षित या विद्वान क्यों न बन जाएं, लेकिन उस इतिहास और पुराण को छोड़कर केवल आज के पंचांग के आधार पर किसी भी निर्णय को निर्धारित करना उचित नहीं है।

कुछ कमेंट में मुझे प्रमाण दिखाए गए हैं। उन सभी प्रमाणों का हम एक-एक करके उत्तर देते हैं।

*जिउतिया व्रत* के संबंध में अब भविष्य पुराण की कथा की बात कर रहे हैं। ठीक है, चलिए इस पर भी बात कर लेते हैं।

एक श्लोक लिखा है, जिसमें जीवित्पुत्रिका व्रत के लिए *अष्टमी और प्रदोषव्यापिनी तिथि* की बात कही गई है। तो इस बात को समझते हैं।

अष्टमी तिथि 3 तारीख को सूर्योदय के समय है नहीं?* 3 तारीख को सूर्योदय *सप्तमी तिथि* में हो रहा है और सूर्योदय के समय जो तिथि होती है, उसी को उस दिन की तिथि माना जाता है।

इसे एक उदाहरण से भी समझना पड़ेगा। बचपन में जब किसी बच्चे का जन्म होता है, उसी समय से उसके भविष्य की कुंडली तैयार की जाती है। उसी प्रकार व्रत की शुरुआत ही अगर गलत तिथि से हो रही है, तो फिर आगे की बात करना उचित नहीं होगा।

जब व्रत 3 तारीख को *सप्तमी तिथि* में शुरू हो रहा है और स्पष्ट रूप से कहा गया है कि *सप्तमी में व्रत शुरू ही नहीं करना है*, तो आगे की बात हम बाद में करेंगे।

अब बात करते हैं *निर्णय सिंधु, विष्णु धर्मोत्तर, तिथि चंद्रिका, वर्षकृत* आदि के जिन प्रमाणों का उल्लेख किया गया है।

इन सभी प्रमाणों में कुछ सुझाव दिए गए हैं। लेकिन ये सुझाव भी उस कथा को पूरी तरह न्यायोचित नहीं ठहराते, जिसे हम लोग बचपन से सुनते आए हैं।

माताएं जिउतिया के दिन *जीवित्पुत्रिका की कथा* सुनती हैं। निर्णय सिंधु, विष्णु धर्मोत्तर, तिथि चंद्रिका और वर्षकृत आदि प्रमाण अलग-अलग विद्वानों द्वारा अलग-अलग स्थानों पर लिखे गए ग्रंथ हैं।

लेकिन सबसे बड़ा प्रमाण वह *कथा का ग्रंथ* है, जो आज का बनाया हुआ नहीं है, बल्कि हजारों वर्षों से चली आ रही परंपरा का हिस्सा है।

इसलिए आज के पंचांग, निर्णय सिंधु, विष्णु धर्मोत्तर, तिथि चंद्रिका और व्रत-संबंधी ग्रंथों में दिए गए जिन प्रमाणों का आपने उल्लेख किया है, वे *सप्तमी युक्त जिउतिया करने की अनुमति नहीं देते*।

इसीलिए आपके द्वारा दिया गया तथ्य *3 तारीख को व्रत करने के पक्ष में प्रमाणित नहीं होता।*

जीवित्पुत्रिका व्रत का पारण

जब आपका आधार मजबूत होगा तो आपका भविष्य भी अच्छा होगा। व्रत की शुरुआत अगर अच्छे समय में आप करेंगे तो उसका पारण भी सही होगा।

क्या केवल पारण को सही समय पर करने के लिए सप्तमी तिथि में व्रत शुरू करना उचित है, जबकि लगभग चार घंटे सप्तमी तिथि में माताएं व्रत करेंगी?

व्रत की शुरुआत अष्टमी तिथि में होगी, जो कि उदय तिथि है। इसीलिए उसी दिन व्रत की पूजा भी प्रदोष काल में होगी। सुबह लगभग 5 बजे तक नवमी तिथि है। इसीलिए अष्टमी और नवमी में पूरा जीवित्पुत्रिका व्रत माताएं रखेंगी।

अब आप पारण का जो प्रश्न कर रहे हैं, तो जिन किताबों और पुस्तकों में हम लोग पढ़ते हैं, उनमें पारण के लिए उतना ज्यादा दोष नहीं बताया गया है, जितना सप्तमी वेध में बताया गया है। हां, यह जरूर कहा गया है कि नवमी में पारण करना चाहिए, लेकिन यह नहीं कहा गया है कि अगर नवमी में पारण नहीं किया जाता है तो उसका कोई बहुत ज्यादा प्रभाव या दोष लगेगा। इसलिए ऐसी स्थिति में पारण सुबह सूर्योदय काल में कभी भी किया जा सकता है, उसमें कोई दोष नहीं है।

एक और उदाहरण देकर इसे समझना पड़ेगा।

किसी भी काम की शुरुआत हम लोग करते हैं तो अच्छे मुहूर्त का चयन करते हैं कि पूजा की शुरुआत अच्छे मुहूर्त में की जाए। या जैसे मान लीजिए कि बच्चे का उदाहरण लेते हैं। बच्चों का जब जन्म होता है तो उस समय मुहूर्त देखा जाता है। अब उस समय आप बच्चे के आगे का भविष्य मुहूर्त तय नहीं करते हैं। जब उसका जन्म ही अच्छे मुहूर्त में हुआ है तो उसका पूरा भविष्य भी अच्छा ही होगा। इसीलिए व्रत की शुरुआत अच्छे मुहूर्त में करना यहां पर सबसे महत्वपूर्ण है।

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